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देश में बढ़ती बेरोज़गारी और घटता अन्न

Posted On: 18 Sep, 2019 Common Man Issues में

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vinaytripathi08

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हमारा देश जब तक कृषि प्रधान देश था तब तक न काम की कमी थी न अन्न की | जब से रोज़गार प्रधान देश हुआ तब से ही बेरोज़गारी का टंटा भी शुरू हो गया | गाँव से निकलकर आम आदमी शहरी चकाचौंध में कही गुम सा हो गया | लोगो ने सोचा की शहर में आकर वो तरक्की कर लेंगे पर यहाँ की भीड़ में उनका वजूद भी खो गया | कुछ दिन पहले मैं कार्यवश कही गया था ऑटो न मिलने पर मैंने पैडल रिक्शा का सहारा लिया | रिक्शा वाला अपनी कहानी बताने लगा | पूछने पर पता चला कि वह नज़दीक गाँव का रहने वाला है | गाँव में उसके पास अच्छी खेती है पर शहरी चकाचौंध के चक्कर में उसने गाँव छोड़ दिया और परिवार सहित यहाँ गुजरबसर करने लगा | कमाई का अन्य जरिया न होने पर रिक्शा चलना उसकी मजबूरी थी | रिक्शा से उतरते वक़्त जब मैंने उसको किराये से ज्यादा पैसा दिया तो उसने बहुत दुआ दी जब मैंने कारण पूछा तो बोला की  उसने और उसके बच्चो ने पिछले कुछ दिनों से सिर्फ आधा पेट भोजन ही किया है आज वो सब भरपेट भोजन करेंगे | जब मैंने उसको गाँव वापस जाने को बोला तो उसका जवाब था कि वो गाँव नहीं जा सकता  क्यूंकि वहाँ के लोग उसको बड़ा आदमी समझते है | तब मेरी समझ में आया की गाँव से लोग शहर बड़ा आदमी बनने की चाहत लेकर आते है और यहाँ की भीड़ में दम तोड़ देते है | भारत के कई बड़े शहरो जैसे मुंबई, कोलकाता, दिल्ली, नागपुर, चेन्नई, लुधियाना आदि में विभिन्न प्रदेशो के गाँव से लोग अच्छे रोज़गार की तलाश में आते है और यहाँ पर मजदूरी आदि में लिप्त हो जाते है जबकि अगर वह यही मेहनत अपने गाँव की ज़मीन पर अन्न उपजाने में करे तो शायद उनका वजूद और आत्मसम्मान दोनों ही सलामत बने रहे | आज आप गाँव चले जाइये आप को खेत में काम करने के लिए कामगार न मिलेंगे | कामगार छोड़ दीजिये बंटाई पर खेती करने वाले मिलने भी मुश्किल होते जा रहे है | हमारे बड़े पापा के पास अच्छी खेती है साधन संपन्न है पर फिर भी सभी खेत पर फसल नहीं ऊगा पाते है क्यूंकि उनके दोनों पुत्र शहरी है और गाँव में कामगार है नहीं | गाँव में जाने पर किसी समय जो चहलपहल मिला करती थी अब वो कही खो सी गयी है | ज्यादातर लोग शहर में काम करने लगे है गाँव में आना भी उनको पसंद नहीं है आते भी है तो बस एक रिश्तो की कवायद पूरी करने | महसूस करिये अगर धीरे धीरे सभी गाँव शहर में तब्दील हो जाए उस दिन इस देश का क्या होगा | खाने के लिए अन्न कहा से आएगा | मेरा एक विनम्र निवेदन उन सभी भाइयो से है जो अपने गांव में खेती-बाड़ी का कार्य छोड़कर शहर में आ बसे है कि  अपनी ताकत का इस्तेमाल लोगो के पेट भरने में लगाओ न की अमीरो की तिजोरिया भरने में | किसान इस देश का वो मजबूत स्तंभ है जिसके हिलने मात्र से देश की नींव हिल जायेगी | सरकार से भी निवेदन है कि कृषि को बढ़ावा दिया ही जाना चाहिए | ताकि अन्न और रोज़गार दोनों पैदा हो सके |

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