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कितनी ही बातें.....

Posted On: 5 Nov, 2012 Others में

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vinitashukla

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कितनी ही बातें
मथती हैं मन को
कई कई बार
अंतस के सागर में
उमड़ घुमड़ चलते हैं
लपटों से जलते हैं
अनगिनत विचार
कितनी…………….
यह कैसा मंथन है –
अमृत घट रीता है
नहीं कोई नीलकंठ
अब विष को पीता है
आसुरी छलावे से
छले देवता जाते
कस्तूरी में अटकी
हृदय-हरिण की साँसे!
कुंठा से बद्ध हुए
आकुल उदगार
कितनी ……………
पीड़ा है- दंशन भी
मोह है- सम्मोहन भी
सर्पिल पगडण्डी सी-
जीवन की राहें
भवसागर में-
प्राणों की
नौका लहराए
विप्लव में उलझा
भावों का संसार
कितनी …………….

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