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नागफनी

Posted On: 19 Jan, 2013 Others में

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vinitashukla

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मेरे पास नहीं

बूढ़े बरगद सी बाहें

फैलाकर

जिन्हें अनवरत

बांट सकूं

छांह

वे धरती को चीरती

विकराल जड़ें –

गहराइयों की

लेती जो थाह

पास नहीं मेरे

पीपल का जादुई

संगीत

वो हरी- भरी

काया ,

वह पत्तों का

मर्मर गीत

कोई न

पूजे मुझको

पीपल, बरगद

के मानिंद

कंटकों से

पट गयी है

देह ऐसे-

निकट आते

हैं नहीं

खग वृन्द

मरुथली संसार में

रेत के विस्तार में

जल रहा कण कण जहाँ

कुंठित जीवन जहाँ

वहां वनस्पतियों को –

बनना ही

होता है

नागफनी!

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