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पत्नी नहीं 'पीएम' समझिए

Posted On: 6 Apr, 2015 Others में

तरकश'तरकश' में कई तरह के तीर होते हैं जो जानलेवा, घातक या कम घातक हो सकते हैं। नाम के अनुरूप ऐसे हीं लेख आपको मेरे ब्लॉग में पढ़ने को मिलेंगे।

Virendra Singh

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अपनी नई-नई

और

पढ़ी-लिखी बहू से,

सासू मां  बड़े  प्यार से बोली,

देखो बेटी,

पति, परमेश्वर होता है।

पति का कहना मानना,

पत्नी का धर्म होता है।

सुनते ही पत्नी तपाक से बोली,

नहीं मांजी,

अब ऐसा नहीं होता है।

आजकल पति, परमेश्वर नहीं,

बाकी सब होता है।

बदली हुई परिस्तिथियों में

पति का स्थान,

कुछ इस तरह होता है।

जैसे हमारा देश है,

वैसे ही हमारा घर है।

देश का मालिक राष्ट्रपति होता है।

घर का मालिक पति होता है।

राष्ट्रपति केवल नाम का मालिक होता है।

असली कर्ता-धर्ता तो पीएम होता है।

पीएम को सलाह देने वाला

एक मंत्रिमंडल भी होता है।

उसे

कुछ नेताओं का  बाहरी समर्थन भी होता है।

मांजी,

पीएम बेहद शक्तिशाली होता है।

जो समर्थन नहीं देते,

उनके लिए मुसीबत पैदा करने वाला होता है।

इधर घर में,

राष्ट्रपति की तरह,

पति भी केवल नाम का ही मालिक होता है।

घर में पत्नी का स्थान,

देश के पीएम की तरह होता है।

पत्नी को सलाह देने के लिए ,

उसका भी एक ‘निजी मंत्रिमंडल’ होता है।

जिसमें

उसकी मां का स्थान मुख्य होता है।

साथ में

पारिवारिक सदस्यों के साथ ही उसे

कुछ रिश्तेदारों का भी बाहरी समर्थन होता है।

इस तरह,

पत्नी भी बेहद शक्तिशाली होती है।

पति और उसके घरवालों पर,

भारी पड़ने वाली होती है।

समर्थन नहीं करने वालों का,

जीना मुश्किल करने वाली होती है।

मांजी आगे सुनिए,

जैसे पीएम की सलाह पर,

राष्ट्रपति को चलना होता है।

वैसे ही पत्नी की सलाह पर,

पति को चलना होता है।

कभी-कभी राष्ट्रपति की तरह

पति को भी,

पत्नी की माँगों को न कहने का,

या

उन पर पुनर्विचार करने का,

संशोधन का,

या

उन माँगों को,

कुछ समय तक टालने का अधिकार है।

लेकिन ये केवल नाम के ही अधिकार हैं।

व्यवहारिक दृष्टि से बेकार हैं।

क्योंकि,

आखिर में राष्ट्रपति की तरह,

पति को भी,

पत्नी की सभी मांगों को मानना ही पड़ता है।

मांजी,

पति और राष्ट्रपति के अधिकारों में अंतर भी होते हैं।

समर्थन के अभाव में

राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री को हटा देता है।

लेकिन

पति को ऐसा कोई अधिकार नहीं है

समर्थन न होने पर भी

पत्नी से पीछा छुड़ाना आसान नहीं है।

पीएम को राष्ट्रपति की पिटाई

या

उसके सामने चिल्लाने का अधिकार नहीं होता।

वहीं पत्नियां,

पीटने के अधिकार को लेकर भ्रम में हैं।

जहां कुछ पत्नियां खुल्लम-खुल्ला

इस अधिकार का प्रयोग करती हैं।

तो वहीं कुछ पत्नियों को

ऐसा करने में घोर आपत्ति है।

लेकिन

पति पर चीखना-चिल्लाना ख़ूब करती हैं।

मांजी,

आगे बस इतना ही कहूंगी,

मैं भी इस घर की पीएम बनकर,

अपने ‘निज़ी मंत्रीमंडल’ के दम पर

घर को चलाउंगी।

पति से जो चाहूंगी,

वही कराउंगी।

आप मेरी एक बात मान सकती हैं।

मेरा समर्थन कर सकती हैं।

लेकिन समर्थन के बदले,

मैं आपकी कोई शर्त नहीं मान सकती हूं।

क्योंकि आप जानती हैं,

मैं ये घर आपके के बिना भी चला सकती हूं

लेकिन ऐसे में आपके लिए

अति कष्टकारी मुश्किलें पैदा कर सकती हूं।

इसलिए आप सोच समझकर निर्णय लेना।

वरना,

बाद में मुझे दोष मत देना।

इससे ज्यादा क्या कहूं,

आप भी तो थी कभी बहू।

इसलिए समझ जाएं।

पति परमेश्वर नहीं होता,

ये  मान जाएं।

मांजी

मैं तो बहुत थकी हूं,

आप भी थक गई होंगी।

इसलिए अब आप चली जाएं।

हां,

मेरे लिए एक कप चाय जरूर भिजवाएं।

सास ने  कुछ सोचकर बात आगे नहीं बढ़ाई,

बहू के लिए एक कप चाय भिजवाई

और

चुप रहने में ही समझी भलाई।

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