blogid : 4346 postid : 774757

जी हां मैं बात कर रहा हूं अरविन्द की। (जन्मदिन पर समर्पित)

Posted On: 18 Aug, 2014 Others में

mystandpointJust another weblog

vishnu1941

30 Posts

36 Comments

जी हां मैं बात कर रहा हूं अरविन्द की।
(जन्मदिन पर समर्पित)

मैं मदर टैरेसा का परम भक्त हूं और अवश्य ही उस आलौकिक शक्ति को एक साक्षात देवी से कम नहीं समझता। जिस व्यक्ति को देवी मां मदर टैरेसा का आशीर्वाद मिला हो, जिसे उस देवी के साथ विश्व के सर्वोच्च सेवा आश्रम में लाचारों और असहायों की सेवा करने का अवसर मिला हो, उन लाखों लाचारों और असहायों की दुवाएं मिली हों, जिसकी प्रेरणा श्रोत स्वय मां टैरेसा हो, जिस व्यक्ति में दीवानगी इतनी कूट-कूट कर भरी हुई हो कि एक नम्बर की घूस की इन्कम टैक्स ज्वाइंन्ट कमिशनर के पद को छोड़ कर, अपने परिवार में पैसों का अम्बार और अपनी स्वय की रियासत और जागीर खड़ी न कर, देश सेवा में कूद पड़े, क्यों न विश्वास करें उसका? क्या हमने आज के युग में कोई ऐसा सिरफ़िरा देखा है जो अपने जन्मदिन के उपहार बेच कर गरीबों में पैसा बांट दे? जी हां मैं बात कर रहा हूं अरविन्द की। आजकल तो सत्ता पाने के लिये लोग अपने को “चाय वाला”, दलित और “नीच” कह कर इसकी कीमत बसूलते हैं। लाल बहादुर शास्त्री और जयप्रकाश नारायण जी ने तो अपनी गरीबी की कीमत सत्ता के रूप में कभी नहीं मांगी। आज अधिकतर ‘सिविल सर्वेन्ट’ इतना कमाते हैं कि अपनी जागी्र और रियासत बना लेते हैं। क्या कमी थी एक सभ्रान्त और सम्पन्न परिवार में जन्मे इस बेटे को? क्या जरूरत थी सारे ऐशो आराम छोड़ कर देश के कोने कोने मे जाकर धूल-मिट्टी और ‘डायबिटीज़’ की दवा फ़ांक कर देश सेवा करने की? क्या जरूरत थी मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ देने की? ऐसे लोग विरले ही है आजकल जब पूरी दुनिया भौतिकता के पीछे भाग रही है तो एक आदमी अपनी जान की कीमत पर समाज की गन्दगी साफ़ करने के लिए धूल-मिट्टी और ‘डायबिटीज़’ की ‘टेबलेट’ और ‘केपस्यूल’ फ़ांक रहा है।

यदि दोनों भ्रष्ट राजनैतिक दलों से सांठ-गांठ कर लेता तो क्या किसी की सरकार मे ‘कैबिनेट मत्री’ बनना बहुत कठिन था इसके लिये? क्यों कहते हैं हम ऐसे व्यक्ति को राजनैतिक महत्वाकांक्षी? ऐसे आदमी को हम अपनी भाषा मे सनकी और सिर फ़िरा कहते हैं। आज देश मे बुद्धिजीवियों के अलावा ऐसे सनकियों और सिर फ़िरों की जरूरत अधिक है। ऐसे व्यक्ति से जुड़े हुए उसके समर्थक भी सनकी और सिर फ़िरे कहलाते हैं। कोई बात नहीं। उन पर विश्वास करना आवश्यक है। उनका रास्ता आसान नहीं है। देश सेवा की चरम सीमा की महत्वाकांक्षा रखने वाले इस तरह के व्यक्ति को यदि उसके कुछ विरोधी “महत्वाकांक्षी” कहते हैं तो उनका स्वागत है। काश कि हम सभी ऐसा ही करते। इस शब्द से प्रेरणा मिलती है। याद रखिये कि इस व्यक्ति में सेवा का जन्मजात बीज है, चाहे वह देश सेवा हो या दरिद्र नारायण सेवा। यही बीज आज अंकुरित होने का प्रयास कर रहा है। हर युग में पैदा हुए कुछ जयचन्दों और मीर ज़ाफ़रों को छोड़ कर देश की आने वाली और मौजूदा पीढ़ियां कम से कम “भ्रष्टाचारी”, “दुराचारी”, “चोर”, “डकैत”, “बलात्कारी”, “दुष्ट”, “देश बेचने वाले देशद्रोही” आदि सम्मानों से तो उसे और उसके समर्थकों को उन्हें नहीं नवाजेंगी।

मैनें कभी भी अरविन्द को देवी देवता की पदवी से नहीं नवाज़ा।. मेरे एक मित्र ने कल मुझ पर कटाक्ष करते हुए “अरविन्द चालीसा” लिखने का सुझाव दिया है जिसका मेरा कोई इरादा नहीं है। हर व्यक्ति अपने गुणों और कर्मों से देवी या देवता समान पुजता है। अरविन्द और उसकी टीम मानवीय कमजोरियों के पुतले हैं, ईश्वर नहीं। उनमें ईश्वर की छवि है न कि शैतान की। अनुभवहीन होने के कारण वे गलतियॉ तो कर सकते हैं परन्तु बेईमान और भ्रष्ट नहीं हो सकते। हम बुज़ुर्गो का फ़र्ज़ बनता है कि हम इनके कान पकड़ कर इन्हें पथभ्रष्ट होने से रोकें। आज देश इन अनुभवहीन दीवानगी की हद तक समर्पित युवाओं को तो सहन करने को तैयार है पर इन सर्वगुण सम्पन्न चोरों, लुटेरों और अपराधियों को नहीं। समय सच्चाई को उजागर करेगा और उनके प्रयासों से एक दिन देश और समाज भ्रष्टाचारमुक्त अवश्य होगा।

कोई भी व्यक्ति आरम्भ में हर क्षेत्र में निपुण नहीं होता चाहे वह राजनीति हो या कोई अन्य कोई क्षेत्र। लेकिन वह अपनी और दूसरों की गलतियों और अनुभव से सीखता अवश्य है। हम सबकी यही अपेक्षा है। अरविन्द जैसा व्यक्ति तो खुल कर कह रहा है कि मुझे राजनीति नहीं आती। लेकिन निश्चय ही वह भ्रष्ट पार्टियों से राजनीति नहीं सीखेगा। भ्रष्ट पार्टियां समय आने पर खुद अरविन्द से सीखेंगी कि अच्छी राजनीति कैसे की जाती है। इसकी शुरूआत भी कहीं-कहीं नज़र आ रही है। आप समझते हैं कि जब शेरनी अपने शिशु को शिकार करना सिखाती है तो क्या उसका शिशु तुरन्त ही यह कला सीख लेता है? वह असफ़लता और सफ़लता के बीच कितने प्रयास करता है? आखिर अपने अस्तित्व के लिये वह सफ़ल अवश्य होता है। उसी प्रकार मकड़ी जब दीवार पर चढ़ने की कोशिश करती है, कितनी बार गिरती है, कभी सोचा है हमने और आपने? सार्थक और सकारात्मक व्यक्ति लक्ष्य की ओर ध्यान अधिक देते हैं न कि उसे प्राप्त करने में सफ़लता या असफ़लता पर। ये तो लक्ष्य के आवश्यक अंग हैं।

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 1.00 out of 5)
Loading...
  • Facebook
  • SocialTwist Tell-a-Friend

अन्य ब्लॉग