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“येल विश्वविद्यालय की डिग्री”: मत्री जी की जग हँसाई

Posted On: 13 Aug, 2014 Others में

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vishnu1941

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पिछले 5 दशकों से अधिक प्रबन्ध के क्षेत्र में परामर्शदाता, प्रशिक्षक व अन्वेषक का अनुभव व दक्षता-प्राप्त विष्णु श्रीवास्तव आज एक स्वतंत्र विशेषज्ञ हैं। वह एक ग़ैर-सरकारी एवं अलाभकारी संगठन “मैनेजमैन्ट मन्त्र ट्रेनिंग एण्ड कन्सल्टेन्सी” के माध्यम से अपने व्यवसाय में सेवारत हैं। इस संगठन को श्री श्री रविशंकर का आशीर्वाद प्राप्त है। विष्णु श्रीवास्तव ने “आर्ट ऑफ़ लिविंग” संस्थान से सुदर्शन क्रिया व अग्रवर्ती योग प्रशिक्षण प्राप्त किया। उन्हें अंग्रेज़ी साहित्य व ‘बिज़नेस मैनेजमैन्ट’ मे स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त हैं। वह “वरिष्ठ नागरिकों की आवाज़” नामक ग़ैर-गैरकारी संगठन में सक्रिय रूप से जुड़े हैं। इनके कई व्यावसायिक लेख “प्रॉड्क्टीविटी” और “इकोनोमिक टाइम्स” मे प्रकाशित हो चुके हैं।

कितना आघात पहुँचा यह जान कर कि हमारी मानव ससाधन विकास मत्री को एक प्रमाणपत्र और विश्वविद्यालय की डिग्री में अन्तर तक नहीं पता। हमारी मत्री भारतीय प्रतिनिधिमंडल की एक सदस्य थीं जो कि अमरीका की येल विश्वविद्यालय में एक 6-दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग लेने के लिये गया था। इस उपलक्ष में येल विश्वविद्यालय ने प्रतिनिधिमंडल के हर सदस्य को कार्यक्रम में भागीदारी के लिये प्रमाणपत्र जारी किया जो कि किसी भी प्रशिक्षण सस्थान के लिये एक सामान्य प्रक्रिया है। इस बात की पुष्टि येल विश्वविद्यालय के इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के आयोजक और निदेशक जार्ज जोसेफ़ ने स्वय की। इस तरह के विवादों से बचने के लिये तुरन्त ही भारत सरकार के मानव ससाधन विकास मत्रालय के प्रवक्ता ने भी की। कितनी हसी होगी येल विश्वविद्यालय हमारे मत्री के अज्ञान, दम्भ और झूट पर? अपने को हर कीमत पर स्नातक सिद्ध करने के लिये हमारी मत्री इसी प्रमाणपत्र को येल विश्वविद्यालय की डिग्री बता रही हैं। इस जग हसाई से असतुष्ट हमारी मत्री चुनौती और धमकी देती हैं कि जिस जिस को येल विश्वविद्यालय की डिग्री देखनी है वह कोर्ट में जन हित याचिका दाखिल करे। महोदया, कहावत है कि एक झूट को छिपाने के लिये हज़ार झूट बोलने पड़ते हैं। हम सभी आपकी योग्यता और प्रतिभा से अत्यन्त प्रभावित हैं। इस मामले से जग हसाई से बचने के लिये और कोई भी प्रमाण या दस्तावेज़ नहीं चाहिये। अगर एक आम आदमी चाहे भी तो भी वह आपके झूट को उजागर करने जन हित याचिका दाखिल करने से विवश है। उसके पास तो दो वक्त की रोटी खा लेने के बाद कल की रोटी का कोई पैसा नहीं बचता है।
मुख्य मुद्दे से भटकाने के लिये आपके तर्कहीन समर्थक कहते हैं कि हमारे सविधान में मत्रियों के लिये शैक्षिक योग्यता का कोई प्रावधान नहीं है। तो क्या हमारे सविधान में इस बात का कोई उल्लेख है कि एक मत्री देश, जनता, सरकार और चुनाव आयोग को तथ्यहीन सूचना देकर अपने गैरकानूनी कुकृत्यों से गुमराह कर सके?

जिस विषय पर हम चर्चा कर रहे हैं उसमें मुद्दा माननीय मानव विकास मंत्री के शिक्षित या अशिक्षित होने का नहीं है। अगर वह अंगूठा छाप हैं तो भी उन्हें सवैधानिक अधिकार है मत्री बनने का। असली मुद्दा है मंत्री द्वारा अपनी शिक्षा के बारे में जनता, सरकार और निर्वाचन आयोग को गलत जानकारी देकर गुमराह करना। यह न केवल अनैतिक है बल्कि गैरकानूनी है। उसके ऊपर भी गुमराह करने के लिये फ़िर एक सफ़ेद झूट येल विश्वविद्यालय से डिग्री होने का। उसके बाद भी जनता को खुले आम चुनौती और धमकी कि जिसको उनकी डिग्री देखनी हो वह न्यायालय में जाकर जन हित याचिका दाखिल करे। इसी को कहते हैं चोरी और सीना जोरी। माननीय मंत्री जी जिस देश में एक आम आदमी के पास दो वक्त की रोटी के बाद कल के भोजन के प्रबन्ध के लिये पैसा नहीं बचता वह अपने लोकतंत्र को बचाने के लिये कैसे जन हित याचिका दाखिल करे? इसके बाद भी आपको अगर गुस्सा आ गया तो उसके खिलाफ़ अवमानना का कोर्ट केस कर देंगी जिसे लड़ने के लिये वह अक्षम है। उसे उसकी इसी मजबूरी के कारण सभी भ्रष्टाचारी और अपराधी उसे मजबूर कर देते हैं कि वह माफ़ी मांग कर इन दुष्टों से छुटकारा पाए और अपनी जुबान बन्द रखे। ठीक यही हाल बेचारे अरविन्द और उसकी आम आदमी पार्टी का है जिनके पास न तो पैसा है और न संसाधन। भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जितने भी खुलासे किये गये क्या उनकी जांच करवाने के लिये पिछली और वर्तमान सरकारों ने कोई स्वतंत्र और निष्पक्ष आयोग का गठन किया? इसके विपरीत भ्रष्टाचारियों की पदोन्नति की गई और राज्यपाल बना दिया ताकि उनके विरुद्ध कोई जांच न हो सके। जो आरोप अरविन्द और आम आदमी पार्टी लगाती आ रही है क्या उनकी पुष्टि सी0ए0जी (CAG) या ए0सी0बी0(ACB) (एन्टी करपशन ब्यूरू) नहीं कर रहे? उस पर चुनौती और धमकी कि अगर आपके पास सबूत हैं तो कोर्ट में जाइये। एक आम आदमी कैसे कोर्ट में जाए जब कि न्यायायिक प्रक्रिया हमारी आशा के विपरीत बहुत महँगी और जीवन पर्यन्त चलने वाली है। तब तक अपराधी और भ्रष्टाचारी की मौज मस्ती!! धीरे-धीरे भ्रष्टाचार का दानव न्यायपालिका में भी प्रवेश कर रहा है और उसकी विश्वसनीयता पर भी प्रश्न चिन्ह लगने लगा है। क्या देश में सच्चे लोकतंत्र को बहाल करने के लिये यह सरकार का कर्त्तव्य नहीं है कि उसकी नीतियाँ जनहित में हों? यह वही सरकार कर सकती है जो भ्रष्टाचार मुक्त हो, जिसमें एक भी अपराधी तत्व न हो।

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