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लो फिर वसंत आई... या आया (1)

Posted On: 20 Jan, 2010 Others में

जागरण संपादकीय ब्लॉगJust another weblog

Vishnu Tripathi

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रात की तरह सुबह भी थरथरा रही थी। फिजां के भी दांत किटकिटा रहे थे। हवा को भी कंपकपाहट छूट रही थी। लेकिन कोहरा तो नहीं था। सब लोग आम दिनों के मुकाबले कुछ जल्दी ही बिस्तर छोड़ चुके थे। घर में सबसे ज्यादा व्यस्त पंपा (हम लोग बाथरूम को पंपा कहते थे) और अंगौछा (तब घर के सभी पुरुषों के लिए नहाने के बाद बदन पोछने खातिर एक ही गमछा या अंगौछा हुआ करता) था। पंपा के लिए एक तरह जैसे क्यू (कतार) लगी थी, एक बाहर निकला और दूसरा तत्काल भीतर। टोंटी से पानी की धार नीचे की ओर थी और भाप की उबार ऊपर की ओर। सीधे टोंटी के नीचे दाखिल हुए, जूड़ी सिर से होते हुए पांव के तलुओं के रास्ते बाहर हो गई। हहरा के नहाए…ओं नमः शिवाय…ओं नमः शिवाय। कूटे हुए काले तिलों को बदन पर मला, एक बार फिर टोंटी के नीचे। तब तक भाई जी ने पंपा की अलगनी पर अंगौछा टांग दिया था। बदन पोंछा, आधे गीले-आधे सूखे। अधोवस्त्र के नाम पर पटरा का जांघिया, बाल काढ़े और सरस्वती जी की फोटो के सामने…या कुंदेंदु तुषार हार धवला…शुक्लां ब्रह्म विचार सार परमां…या देवि सर्वभूतेषु विद्या रूपेण संस्थिता। चौके (रसोई) मे घुसे और तिलकुट (कुटा हुआ तिल और भेली वाले नए गुड़ की मिलौनी) अंजुरी में अंजोरा, छत की तरफ भाग निकले। सुर्ज भगवान आरुणि राग में निबद्ध कोई गीत विलंबित भाव से गुनगुना रहे थे, उस ठंड में उनकी गुनगुनाहट हमें भी कथरी की तासीर का एहसास करा रही थी। ऊपर से ये गुनगुनी और अंदर से तिलकुट की सक्रियता का असर।

 

छत के दूसरी तरफ पीत वस्त्रों में अम्मा और बुआ अजिया (पिता जी की बड़ी बुआ) तुलसा जी के सान्निध्य में हैं। अइपन (पिसे हुए गीले चावल और हल्दी का मिश्रण जो विशुद्ध वासंती रंग को हो जाता है, अइपन शायद आलेपन या अल्पना का देशज-अपभ्रंश हो गया) से तुलसा जी का चौरा लीपा जा रहा है। तुलसा जी नहलाई जा रही हैं। उन्हें पीतांबर ओढ़ाया जा रहा है। सुहाग-सिंदूर लगाया जा रहा है। तिलकुट का भोग लगाया जा रहा है। अब धूप (अगरबत्ती) दी गई और लीजिए आरती भी शुरू हो गई…जय तुलसा मैया,रानी जय तुलसा मैया। मालिन अजिया भी आ गईं। वो चार भेंटें लाई थीं। भेंट माने अइपन से रंगे-पुते मिट्टी के हुंडा यानी कुल्हड़ में भरी हुई पिलखुआं दोमट मिट्टी। उस मिट्टी में खुंसी हुई गेंदा, खासकर जाफरी की चार सींकें (जैसे माला बनाने के लिए गेंदे को सूत के धागे में पुहते हैं, पिरोते हैं वैसे ही भेंटों के लिए गेंदें के फूल महीन सींकों में पुह दिये जाते थे और खड़ी लड़ी तैयार हो जाती थी)। भेंटें उस जमाने के गुलदस्ते थे, बुके थे। एक भेंट तुलसा जी के चौरे पर, दूसरी सरस्वती जी के समक्ष, तीसरी पंपा में और चौथी चौके में। ये तो हमने बाद में निहितार्थ निकाला कि चूंकि पंपा शुद्धता का प्रतीक था और चौका, मां अन्नपूर्णा का मंदिर यानी समृद्धि का प्रतीक, सो इन दोनो स्थानों को भी वसंत की शुभकामना के तौर पर भेंटे भेंटाई जाती थीं।

 

नीचे आंगन में धोबिन चाची (कल्लू बरेठा की अम्मा) गोहार लगा रही हैं। बिप्पू की अम्मा, अद्दू की अम्मा, धुन्ने की अम्मा…(ये अम्मा लोग अधिकतर बेटों के नाम से ही क्यों पुकारी जाती हैं।) धोबिन चाची पालथी मारे, डलिया पसारे आंगन के बीचो-बीच देवी मां की भांति स्थापित हैं। उनका तेल पुता सिर पूरी तरह सिंदूर से लबरेज है, घरों-घरों से सुहागिनों से सुहाग लेते-लेते, देते-देते। वो अति श्यामा थीं कसौटी के पत्थर सरीखी, बाल उनके झक्क सफेद और ऊपर से सिंदूर का जबर्दस्त अतिक्रमित पुट और पीला अंगरखा (ब्लाउज का बुश-शर्ट नुमा बड़ा भाई, जिसमें आजू-बाजू जेब भी होती है)-पीली धोती। अब आप ही उस दैवी छवि की कल्पना करके देखिये।। एक-एक करके अम्मा लोग धोबिन चाची से सुहाग का आदान-प्रदान कर रही हैं (इस परंपरा का लाजिक आज तक समझ नहीं आया)। उनकी डलिया में यथा स्थान तिल, गुड़, अमरूद, आलू, पैसा धरे जा रही हैं। मुनीमिन चाची ने उन्हें इस बार नई धोती भी दी, तीन बेटियों के बाद बेटा जो हुआ है, उनका ये पूरा साल कुड़वार मनेगा। धोबिन चाची गईं और ज्ञाना बुआ (नापिताइन-नाउन बुआ) का रंगमंच रूपी आंगन में आगमन। एक के ऊपर एक तीन बंसेलिया (बांस की डलिया), सब पेरी या पियरी (पीले रंग से रंगा सूती झीना कपड़ा) से ढकी हुई। ज्ञाना बुआ समग्र मोहल्ले की रिलेशन इनसाइक्लोपीडिया हैं, उन्हें मालूम है कि किस परिवार का किस-किस से व्यवहार है और किस स्तर का। उनका अम्मा लोगों से ननद-भौजाई का रिश्ता है। आते ही आंगन में पसरना और चौके में व्यस्त किसी एक भौजाई से उनका चुहल करना, ठठा कर हंसना। हंसी एक सायरन की तरह थी जो ताकीद कर देती थी, बाअदब, बामुलाहिजा! ज्ञाना बुआ पधार गई हैं। पूरे मकान में रहने वाली अम्मा लोग, चाची लोग, दिद्दा लोग या हम लोग, (प्रत्येक परिवार का कोई एक प्रतिनिधि) थालियां लेकर उनके इर्द गिर्द इकट्ठा हो जाते। वो एक-एक करके बंसेलिया से मैदा की पूड़ी, पुआ, लड्डूट, लेड़ुआ, बालूसाही, कुज्झा (चीनी यानी शक्कर से बना हुआ कोई भी पात्र) आदि थालियों को पहचान-पहचान कर यथा व्यवहार रखती जातीं। साथ-साथ कमेंट्री जारी रखतीं, राम स्वरूप भैया के नाती भा है, यो मूलचंद के लड़िका की ससुरार से आओ है। वस्तुतः ये वसंत पंचमी का बायन था।

 

चौके में खटपट शुरू हो गई है। अंगीठी में चाय बन रही है और चूल्हे पर चढ़ी कढ़ाई से फुलौरी (बेसन की डमरूनुमा पकौड़ी, जिनकी कढ़ी भी बनती थी) निकल रही हैं। वासंती फुलौरियों के साथ चाय की चुस्कियां। एक-एक करके सबके कपड़े निकल रहे हैं। हम जैसों के लिए लंकलाट (एलगिन मिल का लांग क्लाथ) का चूड़ीदार पैजामा और कुर्ता। टेलर मास्टर साहब (आ. स्व. शर्फुद्दीन मास्टर, फाइन आर्ट टेलर्स वाले, जो हमारे मकान के शुरुआती किरायेदार थे) ने दो दिन पहले ही सिल कर दिये थे। अम्मा ने उन्हें वासंती रंग में पूरी तरह रंग दिया था। अब उन्हें पहनने की बारी है। चहुं ओर वसंत ही वसंत। सब वासंती में रचे-बसे-पगे। तन ही नहीं बाल मन भी वासंती हो रहा है। नीचे चबूतरे पर रामनाथ चच्चू सबको रेवड़ी बांट रहे हैं। ज्यादा से ज्यादा पाने की होड़। अचानक हुजूम दूसरी दिशा में मुड़ा, छोटे मामा थोड़े आधुनिक हो गए हैं, वो आज रेवड़ी के बजाय सबको हूलागंज की भुर्रा गजक खिला रहे हैं। बच्चन लाल सेठ (हलवाई) ने हर साल की तरह खास वासंती पेड़े बनवाये हैं, सब ईमानदारी से उनकी दुकान के चबूतरे पर रखे थाल से एक-एक करके सिर्फ एक पेड़ा उठा रहे हैं। मन ही मन ये कामना कि उनका कारोबार खूब फले फूले। नन्नो (नानी) हम लोगों का इंतजार कर रही हैं। (दरअसल शहर में हमारा घर और ननिहाल एक दूसरे से सटे हुए हैं।) बारी-बारी से पैर छू रहे हैं और आशीर्वाद में नन्नो से मिल रहा है दस पैसे का सिक्का। इसके बाद मामा और मइयां (मामी) लोगों से भी पैसे मिलने वाले हैं। बड़कऊ तिवारी आवाज दे-देकर गाय-बछड़ों-बछियों को बुला रहे हैं, उनके लिए तिल के लड्डुओं और खालिस गुड़ का इंतजाम किया गया है।

 

खाने का वक्त हो गया। फुलौरी की कढ़ी बनी है, एकदम वासंती। नए चाउर (चावल) की महक सबको सोंधिया रही है। अम्मा ने केसर का हल्का पुट देकर भात को भी वासंती रोगन दे दिया है। रसाजैं (इनका रंग और मिजाज भी वासंती होता है) भी बनी हैं। आज के लिए बेझरा में चने का अनुपात कुछ ज्यादा ही बढ़ा दिया गया था, सो रोटी भी कुछ वासंती-वासंती। भोजन-पानी के बाद छत या रामलीला वाले पार्क की बारी। सुर्ज भगवान से होड़ लेतीं कनकैया (पतंगें) भी आसमान में जोर मार रही हैं। कुछ तन रही हैं, कुछ झुक रही हैं, कुछ कट भी रही हैं, कुछ नए उछाह के साथ वासंती आंगन में पदार्पण कर रही हैं। पीली पतंगों के मेले ने आकाश को भी वासंती उछाह से सराबोर कर दिया है। दोपहर थोड़ी ढलने को ही है और घर में गांव जाने की तैयारी हो रही है, आखिर प्रत्येक वसंत पंचमी को गांव में होने वाली धनुष यज्ञ या परशुरामी का आनंदोत्सव भी तो बाकी है। (इस प्रसंग की चर्चा कभी आगे।)

 

आज जागरण जंक्शन के बहाने 35 साल पहले की वसंत पंचमी याद आ गई। जो अब सिर्फ यादों की ही होकर रह गई है।

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