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क्या आज भी चित्रलेखा की तलाश जारी है ? (पार्ट-2)

Posted On: 24 Aug, 2013 Others में

स्त्री दर्पणWomen Development and Empowerment

Women Empowerment

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आखिरी बार हमने आपको उपन्यासकार भगवतीचरण वर्मा के ‘चित्रलेखा’ उपन्यास का एक अंश बताया था जिसमें एक विधवा औरत चित्रलेखा अपनी तमाम जिंदगी पुरुष नाम का सहारा खोजती रहती है ? और आपसे एक सवाल पूछा था कि ‘औरत की जिंदगी में पुरुष नाम का सहारा क्यों’? आपसे मिली प्रतिक्रियाओं के आधार पर और आपके मन में उठे सवालों का जवाब देने के लिए इस बार भी हम इसी विषय पर अपनी चर्चा को जारी रखेंगे.

हर रात इंतजार किया पर इस बार भी…


women-empowerment part-2औरत की जिंदगी को देखने के दो नजरिए होते हैं एक तो वो ‘जब कोई औरत रोती है तो मर्द समाज उसे कमजोर मान लेता है’ और दूसरा वो जो किसी औरत के रोने पर यह कहता है कि ‘आंखें दिल का आइना होती हैं और आंखों से आंसू बाहर निकाल देने से औरत की जिंदगी खुली किताब बन जाती है इसलिए वो मजबूत होती है’.


अधिकांश बार ऐसा होता है जब औरत दूसरों की नजरों से अपने आपको नापने लगती है. वो वही देखने लगती है जो पुरुष समाज उसके लिए देख या सोच रहा होता है इसलिए जब अधिकांश पुरुष औरत को कमजोर मानते हैं तो वो भी अपने आपको कमजोरों की श्रेणी में ही तौलने लगती है.


दूसरों के द्वारा लिए गए फैसले ही औरत को संतुष्टि प्रदान करने लगते हैं. यहां तक कि वो मर्द समाज द्वारा लिए गए फैसलों पर दुबारा विचारा भी नहीं करना चाहती है और यदि कोई औरत ऐसा करती है तो उसे मर्द समाज अपना अंग मानने से मना कर देता है. आखिर क्यों औरतों ने मर्द समाज को इतना हक दिया कि वो निर्णय ले कि कौन सी औरत समाज का अंग होगी और कौन सी औरत नहीं ?

किराए की कोख का पनपता धंधा


बचपन में जब एक लड़की के पिता उसे पराए लड़कों से बचकर चलने को कहते हैं तो वो उस फैसले को मान लेती है जैसे किसी पालतू जानवर को जो सिखाया जाए वो ही सीखता है और जैसा बोला जाए वैसा ही करता है. इसलिए जब उसी लड़की के पिता अचानक उसे अपना तन-मन पराए लड़के के नाम करने को बोलते हैं तो उसे हैरानी नहीं होती है तथा ना ही उसके मन में अपने पिता के प्रति किसी तरह का सवाल होता है. इस वाक्य से हमारा कदापि यह अर्थ नहीं है कि एक लड़की का पिता उसके लिए गलत फैसले लेता है पर हां, इतना जरूर है कि बहुत कम ही लड़कियों के पिता अपनी लड़कियों में सवाल पूछने और अपने निर्णय स्वयं लेने की क्षमता को जगा पाते हैं. इसलिए शायद तमाम जिंदगी एक औरत पुरुष नाम के सहारे को खोजती रहती है.


आगे आपके और हमारे बीच होने वाली चर्चा का आधार भी यही विषय रहेगा ‘औरत की जिंदगी में पुरुष नाम का सहारा क्यों’ ? और हम इस बात की पूरी कोशिश करेंगे कि इस विषय को नए नजरिए से समझा सकें.


Web Title: women struggle stories


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