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वैज्ञानिकों की तरह आप भी पता लगा सकते हैं कि हो रहा है जलवायु परिवर्तन

Posted On: 3 Dec, 2015 Others में

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वातावरण गर्म हो रहा है. आशंका जतायी जा रही है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण धरा डूबेगी जिससे मानवों का अस्तित्व खत्म हो जायेगा. कई देशों के नेता समुद्र किनारे आलीशान होटलों में जलवायु परिवर्तन पर अपनी-अपनी चिंतायें जताने का रस्म निभाते रहे हैं. अफवाहों-आशंकाओं के बीच आम आदमी के लिये यह समझना जरूरी है कि वैज्ञानिक कैसे पता लगाते हैं कि जलवायु में परिवर्तन हो रहा है? आइये, सीमित शब्दों में इसे समझने की कोशिश करें.

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वातावरण में प्राकृतिक रूप से कुछ ग्रीनहाउस गैस रहती हैं जैसे कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन आदि. इनके अभाव में पृथ्वी की सतह का तापमान करीब -20 डिग्री सेल्सियस होता. इंसान चीजों को जलाने या वनों को काटने जैसी अपनी आदतों से इस तापमान में जाने-अनजाने वृद्धि करते रहता है. इस वृद्धि के कारण ही वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों का अनुपात बदलता है.


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जलवायु परिवर्तन के संकेत

विश्व भर में जलवायु परिवर्तन से संबंधित संकेतों की जानकारी देने और उसकी वर्तमान स्थिति बताने के लिये आईपीसीसी की स्थापना की गयी थी. इसमें कार्यरत जलवायु विशेषज्ञ जलवायु में बदलाव को इन संकेतों से मापते हैं.


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औद्योगिक क्रांति की शुरूआत से पर्यावरण में ग्रीनहाउस गैसों और कार्बन डाइऑक्साइड में हुए परिवर्तन का लेखा-जोखा रखा जाता है. इस बात पर भी ध्यान दिया जाता है कि ग्रीनहाउस गैस वास्तव में ऊष्मा का अवशोषण करती है या नहीं! यह जानकारी उन्हें प्रयोगशालाओं से मिलती है.


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जलवायु विशेषज्ञों ने वैश्विक तापमान में 0.85 प्रतिशत की वृद्धि को रिकॉर्ड किया है. उन्होंने बीते शताब्दियों के दौरान समुद्र तल में हुई 20 सेंटीमीटर की वृद्धि के आँकड़े भी जमा किये हैं. जलवायु में हो रहे बदलावों के अध्ययन के लिये मौसम विशेषज्ञों ने ज्वालामुखियों के फटने पर होने वाले परिवर्तनों का विश्लेषण किया है.


आम भी महसूस कर सकते हैं कि हो रहा है जलवायु परिवर्तन

दुनिया के विकसित और विकासशील देश जिस तरह से धरती के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करके अपने लिए ऐशो-आराम की सुविधाएं जुटा रहे हैं उससे वायुमंडल में कार्बन डाईआक्साइड और मीथेन की मात्रा तेजी से बढ़ रही है. इससे हमारे पर्यावरण का संतुलन बिगड़ रहा है. इसका सबसे ज्यादा खामियाजा दुनिया की गरीब आबादी को ही झेलना पड़ रहा है. ग्लोबल वार्मिग के प्रभावस्वरूप तटीय क्षरण हो रहा है जिससे खेतीयोग्य जमीनें कम हो रही हैं. भारत, बांग्लादेश और नेपाल के वन पर्यावरण बदलाव की सर्वाधिक मार झेलने वाले स्थान बन गए हैं और यहां का स्थानीय समुदाय इन बदलावों का शिकार हो रहा है. समुद्र का जलस्तर बढ़ने के कारण भारत के मैंग्रूव जंगलों वाले कई निर्जन टापू डूब गए हैं. विशेषज्ञों की माने तो मैंग्रूव वनों के दक्षिण-पश्चिमी भाग के एक दर्जन से ज्यादा टापू अपनी जमीन का औसतन 65 प्रतिशत हिस्सा खो रहे हैं. इससे भी खराब बात है कि नदी के मुहानों पर खारेपन की बदलती प्रवृत्ति से अच्छी किस्म की मछलियों की तादाद अत्यधिक घट गई है जिससे मछुआरा समुदाय खतरे में है.

पर्यावरण के बिगड़ते स्वभाव के चलते मौसम और जलवायु में बदलाव आ रहा है. कहीं भीषण गरमी हो रही है तो कहीं भयंकर बाढ़ और चक्रवाती तूफान आ रहे हैं जिससे भारी तबाही मच रही है. इसका सीधा असर ग्लोबल वार्मिग बढ़ाने में कोई योगदान न करने वाले लोगों पर पड़ रहा है.


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भविष्य के गर्भ में

आईपीसीसी के अनुमानों के अनुसार वैश्विक सतही तापमान 21वीं शताब्दी के अंत तक 2.8 डिग्री सेल्सियस से 5.4 डिग्री सेल्सियस तक हो सकती है. यह संकेत हैं उस भविष्य के जिस पर मानव का अस्तित्व टिका है.Next….


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