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एरॉन -एक 'वाया' प्यार (कांटेस्ट)

Posted On: 30 Jan, 2014 Others में

V2...Value and Visionextremely CRUDE ; completely PURE

yamunapathak

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इस संस्मरण को पढ़ कर आप को महादेवी वर्मा जी की ना तो गिल्लू की(गिलहरी) याद आयेगी और ना ही नीलू(कुत्ता) की .कारण यह है कि ना तो इसकी भाषा उतनी परिष्कृत है ना ही यह किसी जीव के प्रति प्रत्यक्ष प्रेम से जुडी यादें हैं.सच कहूं तो कुत्ते मुझे कभी पसंद ही नहीं रहे.परन्तु इस धरती पर मुझे जो सबसे अधिक प्रिय है ,उसके कुछ प्रिय शौक में कुत्ते ने भी अपना नाम शुमार किया हुआ था.बस बात यहीं पर आकर मोड़ ले लेती है.दरअसल जन जन्मान्तर का साथ और प्यार के वादे के साथ ‘,सात फेरे सात वचन’ के क्रम में एक दूसरे के सुख-दुःख ,पसंद-नापसंद का ख्याल भी रखना अपेक्षित होता है .’कुछ दूर तुम चलो कुछ दूर हम चलते हैं’ वाले जुमले ने मुझे कुत्ते पालने के लिए विवश कर दिया.मज़े की बात तो यह कि यह स्वीकार करने में मुझे पूरे १५ वर्ष लग गए.प्रथम वर्ष में फ़्लैट का छोटा आकार,बाद के कुछ वर्षों में नन्ही बिटिया की परवरिश और फिर पंद्रहवें वर्ष के पहले के कुछ वर्षों में नौकरी की भाग-दौड़ के तर्क देकर मैंने अपने प्यार के दावे को मज़बूत रखते हुए पतिदेव के कुत्ते के प्रति प्रेम को साझे होने की झूठी तसल्ली दे दी.हाँ ,पतिदेव के स्थानांतरण के बाद जब मैंने नौकरी छोड़ दी तो अब नई जगह में कुत्ते को ना पालने का कोई ठोस तर्क प्रस्तुत करने को रह नहीं गया ..बिटिया भी बड़ी हो गई थी ,नई जगह नौकरी भी नहीं थी और यहाँ घर भी खुला और बड़ा था.

बस ,एक अलसुबह काले रंग के जर्मन शेफर्ड ने नए मेहमान के रूप में मेरा ही स्वागत कर दिया ऐसा इस लिए कह रही हूँ कि उसके आने का मुझे कोई इल्म ना था और जिस अधिकार और अपनत्व से वह घर के बरामदे में बैठा था उससे किंचित मात्र भी आभास ना होता था कि वह इस घर में अभी-अभी आया है .बिटिया ने अपने आधुनिक तकनीक से लैस होने का भरपूर फ़ायदा उठाते हुए इंटरनेट पर उसके लिए नाम खोजना आरम्भ किया और उसका नामकरण कुछ अंग्रेज़ियत सभ्यता के साथ ही हुआ” एरॉन” .वैसे भी कुत्ते के नाम को हमेशा अंग्रेज़ियत (जॉन्टी,सीज़र,शैडो,ब्रूनो,ग्रैमी ,ब्लैकी, इत्यादि) का जामा ही पहनाया जाता है .आदि मानव के जीवन से लेकर सभ्यता के विकास तक कुत्ता ही एक ऐसा जीव रहा जिसे मनुष्य द्वारा सर्वप्रथम पालतू बनाया गया .इस प्राणी की स्वामीभक्ति भी स्वयं सिद्ध सत्य है.फिर भी अंग्रेज़ियत का एहसास कराते इसके नाम ….इसके पीछे की वज़ह मैं आज तक नहीं समझ पाई.इस बाबत महिला गोष्ठी और किटी पार्टी में भी चर्चा की.एक महिला ने कहा,”कुत्ते में अन्य प्राणियों से ज्यादा स्वामीभक्ति के कारण वह भगवन की तरह हमारी रक्षा करता है वैसे भी DOG शब्द को विपरीत पढ़ो तो वह GOD हो जाता है.”दूसरी ने कहा ,”कुत्ते का अंग्रेज़ियत नाम हमारी आधुनिक जीवन शैली का प्रदर्शन है.खैर …..आपको बता दूँ यह वही एरॉन है जिसने बिटिया के आधुनिकीकरण के साथ दादी के परम्परागत संस्कारों में भी अपनी जगह बनाई थी क्योंकि दादी के लिए वह’ एरॉन ‘नहीं बल्कि ‘अहिरावण’ था.(जिसका ज़िक्र मैंने अपने ब्लॉग’मैं आज भी उतना ही मासूम हूँ’ में किया है).

खैर,मैंने भी शर्त रखी कि अगर एरॉन को घर में रखना है तो इससे जुड़े समस्त कार्य का निर्वाहन या तो केअर टेकर करेगा या पतिदेव .हालांकि यह भी जानती थी कि पतिदेव के प्रति यह मेरी झूठी ज्यादती है.ऐसा कभी नहीं होगा.कहते हैं ना ‘अपने मरे बिना स्वर्ग भी नहीं दिखता ‘.अब होता यूँ कि एरॉन को प्यार-पुचकार कर पतिदेव ऑफिस चले जाते और वह नन्हा जीव मेरे पल्ले पड़ जाता था.मैं बेमन से उसे नहलाती खिलाती और घुमाती और इस सारे कार्य निर्वाह के दौरान हर बार डेटॉल से हाथ धोती.किराना सामान की लिस्ट में उससे जुड़े कई सामान के प्रवेश के साथ डेटॉल के रिफिल पैक की संख्या भी बढ़ गई .बजट डगमगाने लगा.(वैसे भी जब कोई नापसंद हो तो उससे जुड़े खर्च अनावश्यक रूप से भार महसूस कराते हैं).अपनापन ही प्रिय होता है ,किसी को अपना मानो तो उसकी बुरी बातों में भी अच्छाई खोज ली जाती है और जब अपनत्व का भाव ना हो तो उसकी अच्छी से अच्छी बातों में भी गलतियां खोज कर उसे नापसंद किया जा सकता है.एरॉन के साथ मेरे सम्बन्ध की भी यही दिक्कत थी .जब भी वह खुला होता किचेन गार्डन को तहस नहस कर देता था .मुझे बहुत दुःख होता था पर था तो मेरे ही सबसे प्रिय की पसंद …तो …सब सह लेती थी .हम जिस जगह रहते थे वहाँ बहुत बन्दर और लंगूर आते थे.मुझे उनके आने का इंतज़ार रहता था क्योंकि वे एरॉन को बहुत डराते थे और वह मूक प्राणी मेरी शरण ढूँढता था .इस बीच मुझ में आई एक तब्दीली ने आहट तक ना दी और पता नहीं कब से मुझे बंदरों के आने पर रोष होने लगा ……उसे घर के बाहर घूमाने के दौरान गली के आवारा कुत्तों से बचाने की भावना जोर पकड़ने लगी.यह मानवीय संवेदना का सहज असर था….एक माँ का किसी भी बच्चे पर उमड़ता ममतामयी स्नेह या पतिदेव के प्रति प्रेम की बढती उम्र का इज़हार …….पता नहीं .पर एक बात अब भी सोलह आने सच थी कि यह किसी कुत्ते के प्रति उपजा प्रेम नहीं था क्योंकि अब भी मैं जब काम की अधिकता होती,कहीं अनजाने चोट लगती या कहीं भी कुछ गलत होता तो सबकी जिम्मेदारी उस जीव पर ही डालती थी.एक दिन उसे घूमाने के दौरान वह गले की खूबसूरत लाल पट्टी से बंधी लोहे की चेन को मेरे हाथों से छुड़ा भाग गया मेरी हथेली बुरी तरह ज़ख़्मी हो गई थी.किसी तरह उसे पकड़ पाई.घर ला कर बांधा और उसी से बात करने लगी …..’एरॉन , तू देख मुझे कितनी चोट लगी है ‘….मेरी आँखें दर्द से भर आई थीं .उसने दाईं तरफ अपनी गर्दन झुकाई अज़ीब सी नज़रों से मेरी तरफ देखा .वैसे यह उसकी चिर परिचित स्टाइल थी यह जताने की कि वह संवेदनशील है और बातों को समझता है.उस दिन एक भी वक्त का भोजन ना स्वीकार कर उसने अपनी इस संवेदनशीलता की सच्चाई पर मुहर लगा दी थी.अब मानो वह मेरे लिए शोध का विषय बनता जा रहा था.पर अब भी वह पेपर ,डोरमैट,परदे फाड़ कर अपने पशुवत व्यवहार का कट्टरता से परिचय देता था.

इसी बीच पतिदेव का स्थान्तरण हो गया और चूँकि नयी जगह पर हमें ग्राउंड फ्लोर के घर नहीं मिल रहे थे अतः हमने एरॉन को सिक्यूरिटी वालों को बतौर उपहार भेंट कर दिया.इस बात को तीन वर्ष हो गए इस बीच कई बार मैंने पतिदेव के कुत्ते के प्रति प्रेम को महसूस किया .दो पग प्रजाति के कुत्ते आये एक मैंने अपनी सहेली को दिया और दूसरा अपनी ससुराल भेजा क्योंकि वहाँ बच्चों को कुत्ते बहुत पसंद हैं.फिर हम नई जगह आये और हमारे घर एक लेब्रा प्रजाति के कुत्ते का आन बान शान से आगमन हुआ.इस बार कुत्ते के प्रति प्रेम रखने वाले कई लोगों ने तार्किक ढंग से अपने-अपने अनुभवों के आधार पर मुझे कुत्ते रखने के सामाजिक ,मनोवैज्ञानिक फायदे भी गिनाये……पर लोगों के तर्क के असर से ज्यादा उम्र की परिपक्वता मुझ पर हावी होने लगी मैंने सोचा जो पतिदेव मेरी हर खुशी का इतना ध्यान रखते हैं क्या मैं उनकी एक छोटी सी खुशी (हालांकि एरॉन के साथ यह खुशी मुझे भारी पड़ चुकी थी)के लिए उनकी बात मान कुत्ते के प्रति प्रेम विकसित नहीं कर सकती !!!!!!!!!!!मैंने उसका नाम रखा ‘राजा’ क्योंकि अंग्रेज़ियत नाम का मोह भंग करने के साथ मुझे उसके महत्वपूर्ण होने का भी एहसास रखना था अतः राजा से बेहतर कोई और नाम ज़ेहन में उभर ही नहीं पाया.कुछ दिन बाद १०-१२ दिनों के लिए हमें शहर से बाहर जाना पड़ा.लौट कर आई तो राजा बहुत बीमार था ,इलाज में काफी वक्त और पैसे लगे.इसी बीच एक जान पहचान की महिला घर आईं. उनके जीवों के प्रति प्रेम और दया की कोई मिसाल ना थी.उन्होंने राजा को अपने घर पालतू बनाने की इच्छा जाहिर की.मन के किसी कोने में दबी कुत्ते के प्रति नापसंदगी का भाव ऐसे जगा मानो बरसों से दबे किसी घाव को बहने के लिए रंध्र मिल गए हों .पतिदेव ने भी संवेदनशील लेब्रा जाति के कुत्ते की परवरिश के दौरान मुश्किल आने की बात को ज़ायज़ ठहराते हुए उन महिला को राजा भेंट स्वरुप दे दिया.

मैंने सोचा शायद राजा की विदाई मेरे पतिदेव के कुत्ते के प्रति प्रेम का क्लाइमेक्स था.पर नहीं…..एक दिन उन्होंने कहा ,”अब मैं कोई रफ-टफ कुत्ता लाऊंगा.मैंने कहा “कुत्ता तो कुत्ता होता है क्या सीधा,क्या रफ-टफ .”पर अचानक कहीं दबी दबी सी यादें जो एरॉन से जुडी थी मन मस्तिष्क में भय और चाह दोनों ही उत्पन्न करने लगीं.मात्र १५ दिनों के बाद काले रंग का एक जर्मन शेफर्ड बरामदे में ठीक उसी तरह मेरा स्वागत कर रहा था जैसे एरॉन ने किया था .उसे देखते ही हिंदी फिल्मों में दर्शाये कुम्भ में बिछड़े भाईयों की कहानी याद आने लगी.वह हूबहू एरॉन था ….मैं सोचने लगी इतनी समता ये अपनी प्रजाति में एक दूसरे को कैसे पहचान पाते होंगे.इस बार नामकरण का कोई झमेला ना था,एरॉन की देख-रेख का आधा-अधूरा अनुभव तो था ही और पता नहीं ज़िंदगी के कितने दिन और बचे हों ये सोच कर मैंने पति देव के इस शौक को अपना शौक बना लिया.नए एरॉन के लिए आनन-फानन में एक छोटा घर भी बन गया.अब वह उसी में रहता है.अतः पेपर ,डोर मैट और परदे फाड़ने जैसी शैतानियाँ नहीं दुहराई जा रही हैं,संवेदनशीलता प्रदर्शित करने की वही स्टाइल दिखाई देती है,सच है प्यार की एक ही भाषा होती है “मूक भाषा”जो होठों से कम आँखों से ज्यादा प्रदर्शित हो पाती है. वह अपने लिए मेरी आँखों में प्यार ढूँढता है .

पर दावे के साथ आज भी नहीं कह सकती कि एरॉन के प्रति मेरा प्यार सिर्फ उसकी वज़ह से है .शायद यह आज भी वाया ही है .वाया पतिदेव !!!!!!!!!!!!!!

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