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कठिन है राहगुज़र...थोड़ी दूर साथ चलो.(jagran junction forum )

Posted On: 26 Aug, 2013 Others में

V2...Value and Visionextremely CRUDE ; completely PURE

yamunapathak

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कवि वर्ड्सवर्थ का कहना है ” least alone while you all alone “कुछ मानते हैं कि ‘जो अकेले चलते हैं ,वे शीघ्रता से बढ़ते हैं…..’अनंत चक्षु का उदघाटन अकेलेपन का वरदान है…..अकेला अर्थात आत्मनिर्भर….वगैरह..वगैरह.

“इंसान इस जग में अकेला ही आता है और अकेला ही लौट जाता है”

बिलकुल सत्य…पर आने और जाने की इन दो चरम बिन्दुओं के बीच की राह अकेली कट जाए व्यवहारिक रूप में कतई संभव नहीं है.कभी अंतरात्मा की आवाज़ तो कभी ज़माने से मुखातिब हो हमारी सदा गूंज उठती है
<>कठिन है राहगुज़र, थोड़ी दूर साथ चलो
बड़ा कठिन है सफ़र,थोड़ी दूर साथ चलो&;/p
>

इंसान (स्त्री-पुरुष) अगर पृथक हो जी सकते तो भाई-बहन,माँ-बेटे,पिता-पुत्री,देवर-भाभी,जीजा-साली ….जैसे ना जाने कितने मधुर रिश्तों से हम कभी परिचित ही नहीं हो पाते.

स्त्री-पुरुष दोनों का ही अकेला रहना मुश्किल होता है पर स्त्री के अकेले रहने का मुद्दा समाज में अधिक विचारणीय हो कर उभरता है…..इसके कई कारण हैं.

प्रथम ,,अकेले रहने की पीड़ा पुरुष कभी बयान नहीं करता क्योंकि उसकी भावनाओं का अभिव्यक्ति पक्ष स्त्रियों की अपेक्षा बेहद कमज़ोर होता है,वह स्वयं को हर हाल में मज़बूत साबित करने की भावना से जकड़ा रहता है.

दूसरा,पुरुष प्रधान तंत्र में अकेलेपन को दूर करने के लिए जिन अस्वीकार्य साधनों को वह कभी-कभी अपना लेता है उसकी स्वीकृति समाज उसे जिस सीमा तक देता है उसका अल्पांश भी एक स्त्री के लिए बर्दास्त नहीं कर पाता.

उपरोक्त दोनों बातों के अतिरिक्त एक बात यह भी है कि अगर स्त्री-पुरुष को अकेले रहने की स्वीकृति पर अगर प्रश्न किया जाए तो स्त्रियाँ अल्पांश में ही इस बात के लिए राजी होंगी.उनका स्वेच्छा पूर्वक अकेला रहना बहुत ही अपवाद रूप में दृष्टिगोचर होता है.

यह अकेलापन अगर हमसफ़र की अनुपस्थिति के कारण हुआ तो कोई अन्य पुरुष रिश्ता बेटा,भाई,देवर या अन्य उनमें से अधिकाँश को सहारा अवश्य देता है.

स्त्री का स्वभाव नदी जैसा होता है ,वह जानती है कि समुद्र में विलीन होते ही उसकी सारी मिठास खारेपन में तब्दील हो जायेगी पर फिर सदियों से नदियाँ समुन्दर में समाती रही हैं…सिर्फ इसलिए कि वे पुनः बादल बने ..बारिश के रूप में धरती को उपकृत कर जाए.स्त्री का पुरुष से मिलन की यह प्रवृति विश्व कल्याण की दिशा

में एक सशक्त कदम है.


यह एक प्राकृतिक पुकार और चाह है जिसे स्वाधीनता की चाह रखने वाली स्त्रियाँ भी कभी ना कभी अवश्य जीती हैं….उनके अंतरात्मा से भी कहीं ना कहीं यह आवाज़ उठ ही जाती है..
अस्तित्व मेरा जहां खो जाए
अब तू ही बन जा वो ज़रिया
प्रियतम तू ही मेरा सागर है
मैं युगों से तेरी प्यासी दरिया.

स्त्री-पुरुष की स्व निजता में अकेले रहने का समर्थन करने वाले भी अंतर्मन से एक-दूसरे की चाहत की तमन्ना रखते हैं.महिलाओं को पुरुष की ज़रुरत होती है तो पुरुष भी यही ज़रुरत शिद्दत से महसूस करते हैं.अकेलेपन की ज़िंदगी व्यतीत करने वाले कई कवि,लेखक,शायरों की कलम ने भी स्त्री चरित्र को ही अपनी लेखनी के ज़रिये जिया….मृत पत्नी की याद..परित्यक्ता पत्नी के प्रति अपराध बोध या विद्वेष के रूप में..बेवफा पत्नी का दंश …सहकर्मी स्त्री का अवचेतनावस्था का साथ …. ऐसे ना जाने कितने पल होते हैं जब पुरुष अकेला होते हुए भी स्त्री को ही जी रहा होता है.

मगरूर होकर उनसे जो दूर हो गए थे कल

उन्ही के प्यार से महरूम बिलखते है आज<strong>

इसी प्रकार स्त्री वर्ग में भी जो पुरुष विरोधी हैं उनमें से कईयों ने पुरुषों के साथ ज़िंदगी जी है,कुछ ने पुरुषों के अहम् ,कुछ ने अत्याचार..तो कुछ ने स्त्री-पुरुष के संतुलित रिश्तों के बोध के अभाव में अकेले रहने का निर्णय लिया .अगर उन्हें उनके अनुभव के विपरीत रूप में उनकी इच्छानुसार एक सुशिक्षित,विवेकपूर्ण ,संवेदनशील पुरुष का साथ मिल जाए तो वे ‘एक से भले दो’की कहावत को हमेशा सत्य मानेंगी.

अगर इस तथ्य की गहराई को मापा जाए तो यह स्पष्ट है कि स्त्री हो या पुरुष उनके अकेले रहने का निर्णय स्वाधीनता की चाह से ज्यादा एक विवेकपूर्ण,संवेदनशील,मानवीय गुणों से युक्त हमसफ़र के साथ की कमी या एक-दूसरे को समझ पाने की असफलता से उपजी हुई हताशा होती है.

मार्टिन लूथर का कहना है“एक सफल विवाह से प्यारा दोस्ताना और अच्छा रिश्ता और कोई हो ही नहीं सकता.”<>
वहीं तसलीमा नसरीन का कहना है“विवाह का मतलब है औरत को गुलामी की जंजीरें पहनना ,इसलिए औरतों का लक्ष्य होना चाहिए विवाह प्रथा के बदन पर ज़बरदस्त लात ज़माना ,विवाह प्रथा को निर्मूल किये बिना औरत अपनी स्वाधीनता कभी भी अर्जित नहीं कर सकती.”वे आगे लिखती हैं “औरत की ज़िंदगी में सबसे बड़ी असुरक्षा का नाम है -पुरुष औरत का जितना नुकसान पुरुष करता है उतना दुनिया में और कोई नहीं करता..पुरुष की भलमनसाहत जितने दिनों तक टिकी रहे औरत उतने दिनों तक ही सुरक्षित है.”<>

उपर्युक्त दोनों कथन विवाह व्यवस्था तथा स्त्री-पुरुष सम्बन्ध के दो सर्वथा परस्पर विपरीत विचार हैं.जो पृथक अनुभव,परिवेश ,संस्कार ,परवरिश तथा परम्परा से उपजी प्रतिक्रियाएं हैं.

पर मेरी समझ से पुरुष का साथ स्त्री के लिए गुलामी नहीं है बल्कि यह दोनों के व्यक्तित्व विकास,सामाजिक पारिवारिक मजबूती तथा जीवन के प्रवाह के लिए आवश्यक है.वे एक-दूसरे के पूरक बन कर रहे तो यह समाज और परिवार के लिए सर्वोत्तम व्यवस्था होती है. स्त्री-पुरुष के परस्पर किसी भी रिश्ते में शोषक और शोषित का भाव ना हो.ऐसी आज़ादी जिसमें निजी जीवन का अर्थ,मकसद,स्वस्तित्व के मूल्य का भान हो ,यह दोनों के लिए आवश्यक है.साथ रहने की परम्परा सहज,मानवता के अनुकूल और समता पर आधारित हो.अगर यह शादी का बंधन है तो फेरे से ही शुरूआत हो ,स्त्री-पुरुष के द्वारा लिए फेरे आगे पीछे नहीं बल्कि साथ-साथ कदम मिलाते हुए पूरे किये जाएं.स्त्री सिर्फ दायित्व और पुरुष सिर्फ अधिकार के सीमित दायरों से हटकर दोनों ही अधिकार और कर्त्तव्य की गंगा जमुनी मिलन से रिश्ते को प्रवाहमान बनाएं.यह रिश्ता तो दर्पण में अपनी ही छवि देखने सा है,छवि के जितने करीब जाओ,वह भी पास आती है,अपने आंसू,छवि के आंसू बन बहते हैं,अपने लबों पर मुस्कान छवि की मुस्कान बन जाती है.हाँ,इस दर्पण की छवि और स्वयं के बीच एक बारीक सी दूरी ज़रूर होती है …..जो है स्वस्तित्व की,निजता की,स्वाधीनता की और सही मायनों में कहूँ तो दोनों के निज पहचान की .स्त्री-पुरुष का साथ जितनी सहजता,अपनेपन और विवेकपूर्ण ढंग से स्वीकारा जाएगा यह उतना ही मधुर होगा,बस रिश्ते में अहम् का क्षितिज ना हो बल्कि यह नीर-क्षीर मिलन हो जिन्हें अगर कठिनाइयां भी मथें तो माखन ही हासिल हो.

आज मनुष्य का अधोपतन भी दाम्पत्य की विकृति का ही प्रतिफल है..स्त्री-पुरुष के आपसी संबंधों से जन्म लेने वाली संतान के गुण इस बात पर निर्भर करते हैं कि उन दम्पति के परस्पर सम्बन्ध कितने प्रेमपूर्ण,आध्यात्मिक ,पवित्र और समर्पित हैं..जन्म से पूर्व ही बच्चों के संस्कार की इतनी सुव्यवस्था प्राकृतिक रूप से कर ली जाए तो जन्म के बाद उनके संस्कार पर परवरिश के दौरान बहुत मेहनत करने की ज़रुरत ही नहीं रह जाती क्योंकि बीज ही स्वस्थ और अनंत सम्भावनाओं से परिपूर्ण हो जाता है जिसे बस उपयुक्त परिवेश देने की सजगता रखनी होती है.

“its not important to be ahead or behind ;;whats important is to stand side by side .”


अब कठोर व्यवहारिक पक्ष “हर कदम पर महिला को पुरुष के सहारे की ज़रुरत क्यों होती है.?”

हमारे परिवेश ,संस्कार ,अनुभव ही हमारा संपूर्ण व्यक्तित्व बनाते हैं.सामाजिक मानसिकता इसी का परिणाम होती है .अगर इसमें कोई भी तत्त्व रोगग्रस्त हैं तो व्यक्तित्व भी पंगु हो जाता है जो हमारी सोच,विवेक बुद्धि को कमजोर करता है..ऐसा समाज जहां कुछ पुरुष की कुत्सित प्रवृतियां स्त्री की
बुद्धि,बोध,विलक्षनता,आत्मविश्वास,मेधा,दक्षता,प्रतिभा का सर्वथा बहिष्कार करते हुए उसे मात्र हाड-मांस का पुतला भर मान ,उसे भोग्या समझ ले… वहां स्त्री अकेले कैसे रहे !!!!!!!!! किसी पुरुष के द्वारा सताई स्त्री फिर से किसी अन्य पुरुष का ही सहारा लेना चाहती है.बलात्कार ,घरेलू हिंसा,acid attack ,दुराचार ,यौन व्यापार के लिए क्रय-विक्रय जैसे प्रताड़नाओं के चक्रव्युह में फंसी स्त्री का आत्मविश्वास और स्वाभिमान सामाजिक भय तथा लोगों के लांछन और घृणित आरोपों से लडखडा जाता है.

और अधिकाँश स्त्रियाँ पुरुष रिश्ते के सहारे की अपेक्षा रखती हैं.

मैं ऐसा नहीं कहती कि पूरा पुरुष तंत्र गलत है और स्त्रियों के अकेली रहने का अधिकार उन्होंने छीन लिया है .पुरुष प्रधान समाज के प्राचीन सडे-गले कुछ दुर्गंधयुक्त अवशेष ही इसके लिए जिम्मेदार हैं.और इस मानसिकता से ग्रसित पुरुषों में से कुछ की शक्ति ऐसे ही विचार वाली कुछेक नारियों की बैसाखी पर टिकी है.

सास-बहू .के झगड़े,भाभी-ननद के असंतुलित रिश्ते प्रोफेशनल ज़िंदगी में आत्मनिर्भर स्त्रियों की प्रगति रेखा को अन्य से बड़ी करने की ईर्ष्यापूर्ण जिद ….और इन सब का केंद्र भी पुरुष ..उस पर मेरा अधिकार ज्यादा दूसरी का कम …यह संघर्ष और परिस्थितियाँ भी स्त्रियों पर भारी पड़ती हैं.ससुराल से निकाली स्त्री,मायके में भी पनाह ना पाए तो कहाँ जाए…एक स्त्री ही किसी अन्य विवाहित पुरुष की प्रेमिका बन जाए ..तो विवाहिता कहाँ जाए..बलात्कार पीडिता को समाज धिक्कारने लगे तो वह क्या करे…विधवा माँ को बहू-बेटे निकाल दे तो वह क्या … करे ऐसे कई हालत स्त्री को अकेले रहने के लिए विवश कर देते हैं.

pipierre bourdien का कहना है-

“male domination is so rooted in our collective unconciousness that we no longer even see it.it is so in tune with our expectation that it becomes hard to challenge it.”

फिर भी मैं मानती हूँ कि एक स्त्री में असंभव तेज और दृढ़ता होती है…आत्मविश्वास होता है…विषम परिस्थितियों से जूझने की असीम शक्ति होती है.कई अकेली रहने का साहस भी उठाती हैं…स्वेच्छा से कम..परिस्थिति वश अधिक .कई स्त्रियाँ अकेले ही जीवन की गाडी सफलता पूर्वक चला भी रही हैं.पर ऐसी भी कई मामलों में अगर कोई नज़दीकी रिश्ते का पुरुष का साथ नहीं तो भी समाज में कुछेक पुरुष इंसानियत के नाते स्त्री की मदद अवश्य करते हैं.ऐसे में एक इंसान होने के नाते किसी भी स्त्री-पुरुष को नारी -पुरुष वैषम्य भाव से ऊपर उठकर उस अकेली स्त्री को उसके संपूर्ण विश्वास और सम्मान से जीने का वातावरण देना चाहिए.नारी वर्ग आपस में स्वस्थ संपर्क रखे…परस्पर श्रधा,आदर,सहानुभूति के साथ एक-दूजे की क्षमता को प्रोत्साहन दे .

पुरुष वर्ग भी स्त्री के बोध,बुद्धि,प्रतिभा,दक्षा,मेधा के साथ उसे स्वीकार करे,उसे मूक गुडिया या निर्बल समझ उसका अपमान ना करे .यही सुशिक्षा है…यही समाज का तकाज़ा और यही सामाजिक ज़रुरत भी है
.ऐसे में स्त्री अकेली होते हुए भी भावनात्मक तथा सामाजिक दोनों रूप से स्वयं को मज़बूत समझ पायेगी.

सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह कि मृत्यु की सत्यता और अनिश्चितता दोनों को मद्देनज़र रखते हुए प्रत्येक पिता अपनी अविवाहित संतान(पुत्र या पुत्री)दोनों को आर्थिक दृष्टिकोण से समर्थ तथा परवरिश के दौरान मानसिक और भावनात्मक रूप से मज़बूत बना कर रखे ताकि दैवयोग से अगर अकेले रहने की नौबत आये तो वे आत्मनिर्भरता से जी सके.पति को अपनी पत्नी को प्यार के साथ भावनात्मक संतुलन ,आर्थिक आत्मनिर्भरता और अपने वित्त निवेश की जानकारी तथा मानसिक रूप से विवेकपूर्ण बनाने में मदद करनी चाहिए ताकि अगर दुर्भाग्य से पति की मृत्यु के कारण उसे अकेले रहने की विवशता आये तो वह साहस के साथ आत्मनिर्भरता से जी सके कोई भी उसके अकेलेपन का विषैला दंश ना बन सके.
पति के साथ चूँकि आर्थिक निर्भरता जैसी समस्या नहीं होती इसलिए अपने संपूर्ण जीवन काल में पत्नी को भी चाहिए कि वह पति को सामाजिक तथा पारिवारिक संबंधों को प्रगाढ़ बनाने में मदद करे ताकि अगर देव योग से पति को विधुर अकेले रहने की मजबूरी आये तो वह अवसाद ग्रसित ना होने पाए.ये सामाजिक सम्बन्ध उसे अकेलेपन में भी जीने की दिशा देने में बहुत हद तक सहायक हो सकते हैं.

बड़ा मूल्यवान है जन्म,गहनता से मनन करे
सुगम हो ये सफ़र,आओ कुछ ऐसे जतन करे.

relations are not like forest tree;they are plants flourish in the garden with special care according to their individual nature.our duty is to give them required care .

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