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कुरुक्षेत्र से कारगिल तक

Posted On: 5 Mar, 2017 Others में

V2...Value and Visionextremely CRUDE ; completely PURE

yamunapathak

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“मेरे पिता को पाकिस्तान ने नहीं वार ने मारा “
“not Pakistan but war killed my father”
दिल्ली की बीस वर्षीय छात्रा गुलमेहर कौर जिसके पिता भारतीय सेना में captain थे और कारगिल युद्ध १९९९ में शहीद हुए .गुरमीत का यह विडियो यूँ तो पुराना है इसे अभी प्रचारित करने की आवश्यकता ही नहीं है .साथ ही इन सब के दौरान व्हॉट्स ऍप पर गुल मेहर के कार के अंदर बैठी बैठी डांस का विडियो वायरल होने का भी कोई औचित्य नहीं क्योंकि अपने निजी वक्त में कुछ संगी साथियों के साथ कोई किस तरह वक्त गुज़ारता है यह बेहद निजी बात है . खैर बात पहले विडियो की ही करती हूँ . वक्त गवाह है कि युद्ध ना चाहते हुए भी हुए हैं … कुरुक्षेत्र से कारगिल तक …दो पक्ष …दोनों भाई भाई भी …कभी रक्त संबंधों से तो कभी शब्दों और नारों से …कौरव पांडव …भारत पाकिस्तान…हिंदी चीनी …भाई भाई .युद्ध कोई भी हो सर्वाधिक प्रभावित बच्चे और स्त्रियां ही होती हैं .दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जनरल डगलस मैक आर्थर ने भी कहा था ” दुश्मन देश जैसी कोई अवधारणा नहीं होती ,जब युद्ध नहीं चल रहा हो तब मैं दुश्मन सिपाही के साथ हाथ मिला लूँगा या वह मुझसे हाथ मिला लेगा परंतु युद्ध के दौरान हम एक दूसरे को जान से मार देने की कोशिश करेंगे ” ऐसा ही कुछ ब्रिटिश मार्शल माउंटगूमरी ने कहा “सभी राष्ट्र मित्र हैं .युद्ध उन्हें शत्रु बना देता है .”

कलिंग युद्ध के बाद रक्त रंजित मृत और घायलों को देख सम्राट अशोक ने कहा “ओह ! मैंने क्यों इन निर्दोष सिपाहियों को मारा ?क्या ये मेरे दुश्मन थे ?मुख्य दुश्मन तो लड़ाई या युद्ध है “बौद्ध धर्म की पाली अवधारणा कहती है “युद्धम पराभूतम “अर्थात युद्ध के भाव को पराजित करना चाहिए .कोई दुश्मन नहीं है बल्कि युद्ध का भाव ही सबसे बड़ा दुश्मन है .फ्रांस के नेपोलियन बोनापार्ट ने ब्रिटिश एडमिरल होरेश नेल्सन को लिखा था “एडमिरल,चाहे तुम हारो या मैं हारूँ…इससे कुछ नहीं होगा ..ना तो ब्रिटैन और ना ही फ्रांस बल्कि अंतमें यह युद्ध ही होगा जो हंस रहा होगा .”

अब मैं इन सभी उद्धरण के ज़वाब में सिर्फ एक उद्दाहरण रखना चाहूंगी…”मेरे पिता को युद्ध ने मारा ” किसी राष्ट्र विशेष का नाम लिए बिना यह कथन परिपक्व असरदार और स्वीकार्य था .जैसा कि नेपोलियन बोनापार्ट के कथन से झलकता है . “एडमिरल,चाहे तुम हारो या मैं हारूँ…इससे कुछ नहीं होगा ..ना तो ब्रिटैन और ना ही फ्रांस बल्कि अंतमें यह युद्ध ही होगा जो हंस रहा होगा .”

मुझे कहीं पढ़ा हुआ एक सशक्त कथन याद आता है “युद्ध और शान्ति मस्तिष्क की उपज हैं …हम सब मस्तिष्क को आदर्श विचारों से शाषित करें ”

युद्ध है क्या ?एक क्रिया जो घृणा द्वेष हिंसा जैसी भावना की बीज भी है और फसल भी है और भावनाएं मानव के मन मस्तिष्क से ही उपजती हैं .और मानव किसी भूखंड पर रहने वाला मशीन नहीं बल्कि सब से समझदार प्राणी होता है .किसी भी युद्ध की तरह इस युद्ध में भी दो सेना थी .ज़ाहिर है भारतीय सेना ने तो पिता को नहीं मारा पाकिस्तानी सेना ने भी नहीं मारा बल्कि युद्ध ने मारा …पर युद्ध के लिए जिम्मेदार कौन है ??? युद्ध किसी भी भूखंड पर रहने वाले लोगों की ऐतिहासिक सांस्कृतिक भौगोलिक संघर्ष का परिणाम है और संघर्ष दिल और दिमाग की उपज हैं .”युद्ध ने मारा “यह चाहे गुलमेहर ने कहा या ऊपर लिखे कई उद्दहरण का सार हो ..कड़वी .वास्तविकता यह है कि यह बेहद भ्रामक सन्देश है .युद्ध सिर्फ एक क्रिया है जो कर्ता के मन मस्तिष्क की उपज है .चाहे वह एक सुई भर नोक की ज़मीन के लिए लड़ने वाले कुरुक्षेत्र के कौरव पांडव हों या कश्मीर पर दावा कर कारगिल में लड़ने वाले भारतीय और पाकिस्तानी .युद्ध और शान्ति दोनों ही अमूर्त हैं उन्हें मूर्त रूप तो मानवीय बुद्धि और संवेदनाएं देती हैं.भूखंड स्वयं नहीं लड़ता है .यूँ भी भूखंड है क्या …भवन मशीन हथियार तकनीक युद्ध शान्ति …नहीं भूखंड की पहचान है वहां के निवासी उनकी सोच संस्कार संस्कृति तह्ज़ीब मेहनत से सुसज्जित व्यक्तित्व और कृतित्व .चाहे व्यक्ति हो परिवार समाज या राष्ट्र हो…कोई भी युद्ध पसंद नहीं करता .फिर भी पूरे विश्व का इतिहास एक पहलू में संघर्ष की रक्त रंजित स्याही की इबारतों से लिखी गाथाओं की शक्ल में विद्यमान है .तो वहीं दूसरे पहलू में महात्मा बुद्ध महावीर जीसस नानक मोहम्मद की शान्ति की फूल के शक्ल में खुशबू बिखेर रहा है .
युद्ध को रोकने के लिए ज़रूरी है कि भूखंड के लोगों का भावनात्मक संतुलन हो जो शान्ति की अवधारणा को समझ सकें .लोग विश्व के हर कोने से शान्ति की तलाश में भारत ही आते हैं .क्योंकि भारत की पावन भूमि पर युद्ध चाहे जितने भी हुए हों कुरुक्षेत्र के युद्ध के अलावा कभी भी भारतीयों में भाई भाई के बीच युद्ध नहीं हुआ .ऐसे जो भी युद्ध हुए वह बाहर से आये शाषकों के भारत भूमि पर अधिकार कर शाषण करने की मंशा का परिणाम थे . वर्त्तमान में भारत देश हथियारों का सबसे बड़ा आयातक देश है .भारत को शांतिप्रिय देश की कितनीभी उपाधि मिल जाए पर उसे अपने बचाव के लिए हथियार मंगाने ही पड़ते हैं.पांडव लाख शांतिप्रिय थे पर उन्हें भगवान् कृष्ण को सबसे बड़े रक्षात्मक स्त्रोत के रूप में रखना ही पड़ा था. पर अंत में क्या हुआ …कोई पुरुष नहीं बचा ..बची तो सिर्फ महिलाएं और बच्चे . शान्ति और युद्ध तो श्वेत श्याम रंगों की दो सीमा है .स्वयं रंगों को भी कहाँ पता होता है कि वे किसलिए हैं वे भी तो अपने अर्थ के लिए मानवीय बुद्धि और संवेदनाओं की मोहताज़ होती हैं .
यह बेहद ज़रूरी है कि प्रत्येक भूखंड के लोग ख़ास कर सत्ता पर काबिज़ लोग अपने राष्ट्र की आबो हवा मिट्टी पानी को अमन और शान्ति संस्कार और संवेदनाओं से तैयार करें ताकि वह युद्ध घृणा द्वेष से प्रदूषित ना हो सके .ताकि किसी भी भूखंड राष्ट्र में रहने वाले बाशिंदों के दिलोदिमाग में जंग की ज़िद ना हो बल्कि जीने का जोश और जूनून हो .

Peace and war originate in the mind of men .Let the mind should be

governed by noble thoughts .

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