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'चिर परिचित संगिनी हूँ '

Posted On: 22 Apr, 2012 Others में

V2...Value and Visionextremely CRUDE ; completely PURE

yamunapathak

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reading-books_~k4605607यात्रा पर जाने की सारी तैयारी कर चुकी थी;सामान उठाकर मुख्य द्वार तक जाने ही वाली थी कि घर के कोने से एक आवाज़ आयी,“चिर परिचित संगिनी हूँ,मुझे भी साथ ले लो”.कदम यंत्रवत से उस कोने की ओर मुड गए ;जहां अनुभव का अथाह सागर ज्ञान,मनोरंजन,अध्यात्म,संस्कृति,सभ्यता,आचार-विचार आदि कई लहरों को समेटे मुझे पुकार रहा था.जी हाँ,यह मेरी पुस्तकों की दुनिया है.मैंने आलमारी खोल एक पुस्तक बैग में रख लिया .चार पंक्तियाँ यूँ ही गुनगुना गई………………………………………….
टी.वी.कंप्यूटर के युग में क्यों बिसराएँ
गुज़रते वक्त की हर आवाज़ इनमें सुने
हर पल कौन हमारे साथ चल सकता है ?
इसलिए बेहतर है कि हम पुस्तक को चुने .

सच है मनुष्य ज़िन्दगी भर सीखता है और इस प्रक्रिया में पुस्तकें अहम् भूमिका निभाती हैं.पुस्तकों की परम्परा अत्यंत प्राचीन हैं.सबसे पहली पुस्तक वेद थे. वेद ‘विद’ धातु से उधृत है जिसका अर्थ ही है ‘ज्ञान’ rigveda में उल्लिखित गायत्री मंत्र आज भी घर-घर में उच्चारित होते हैं,मुन्दकोपनिषद में से ही हमारे राष्ट्रीय प्रतीक का पवित्र वाक्य ‘सत्यमेव जयते’लिया गया.पहले विद्यार्थी गुरुओं से सुन कर ही पाठ याद कर लेते थे जिसे ‘श्रुति’कहा जाता था पर ज्ञान के इस अथाह सागर को याद रखना और फिर पीढी दर पीढी संवाहित करने की आवश्यकता ने पुस्तकों को जन्म दिया.पुस्तकें मनुष्य की सबसे अच्छी मित्र होती हैं.बड़े-बड़े विद्वान,महापुरुष अच्छे पाठक भी रहे हैं .कहा जाता है कि बादशाह अकबर महान, साक्षर नहीं था पर उसे पुस्तकों का बहुत शौक था उसने एक विशाल पुस्कालय बनवाया और विद्वानों से पुस्तकें पढवा कर ज्ञान अर्जित करता था.

आज इस कंप्यूटर,टी.वी ,के युग में पुस्तकों के पाठक ज्यादा नहीं हैं ये कहना पूर्णतः सही नहीं है क्योंकि आज भी पढने के शौक़ीन लोगों के घरों को पुस्तकों से सजा देखा जा सकता है.पढने की आदत अगर बचपन से ही विकसित की जाए तो यह उम्र भर साथ रहती है .इसके लिए सही उम्र में अच्छी पुस्तकों का चयन आवश्यक है .इससे बच्चों में ज्ञान वृद्धि के साथ कल्पनाशीलता ,रचनात्मकता ,बौधिक क्षमता,भाषा ज्ञान ,शब्द भण्डार वृद्धि,वर्तनी की शुद्धता,एकाग्रता धैर्य जैसे कई गुणों का विकास होता है.वैज्ञानिक शोधों से यह स्पष्ट हो गया है कि जिन बच्चों में पुस्तकें पढ़ने की आदत है उनका I .Q .उन बच्चों से अधिक होता है जो अपना समय टी.वी.या vedeo गेम खेलने में व्यतीत करते हैं. किशोरावस्था में अच्छी पुस्तकें पढ़ने से मार्गदर्शन मिलता है और भविष्य की योजना बनाना आसान हो जाता है.एक उक्ति है ‘एक अच्छी पुस्तक वह है जो आशा के साथ खोली जाए और विश्वास के साथ बंद की जाए”.

पुस्तकें यात्रा के दौरान,प्रतीक्षारत वक्त में ,उब के क्षणों में ,शौक के रूप में,कई लम्हों में साथी बन जाती हैं .नयी-नयी सभ्यता और विभिन्न संस्कृति से हमारा परिचय कराती हैं,एकरसता और बोझिलता दूर करती हैं,हमारे आत्मिक,सामाजिक,मानसिक विकास में सहायक होती हैं,मस्तिष्क को सोचने की नयी दिशा देती हैं
पुस्तक की सदा उसकी जुबा में ……………………
मैं विश्व की हर आवाज़ को शब्दों की स्याही में डुबोती हूँ.
दिल को छूती,ज्ञान से भरपूर कई विधाओं को संजोती हूँ
मैं पुस्तक हूँ,तुम्हारी चिर परिचित संगिनी,मुझे साथ ले लो……………

शैशव’युवावस्था,वार्धक्य जीवन के विविध रंग उकेरती हूँ
हर तबके,हर संस्कृति,सभ्यता के अनुभव को समेटती हूँ
मैं पुस्तक हूँ ……………………………………..साथ ले लो

मानव,पशु-पक्षी,पर्वत नदियों संग अठखेलियाँ करती हूँ
मुखौटे लगे चेहरों की भी शराफत बन रंगरेलियां रचती हूँ
मैं पुस्तक हूँ……………………………………….साथ ले लो

उत्थान पतन की लहरें,ऐतिहासिक स्मृति से उठाती गिराती हूँ
गीले रेत पर पड़े अपने ही निशाँ बनाती और फिर मिटाती हूँ
मैं पुस्तक हूँ………………………………………….साथ ले लो

आज की,कल की,हर पल की गाथा बन जुबां में सजती हूँ
सार्वभौमिक सत्य,वैज्ञानिक रहस्य का हर लम्हा बुनती हूँ
मैं पुस्तक हूँ ………………………………………साथ ले लो

गंगोत्री से निकली यात्रा को,मैं ही गंगासागर ले चलती हूँ
राजा रानी के किस्सों में समा बच्चों के सपनों में पलती हूँ
मैं पुस्तक हूँ…………………………………………साथ ले लो

कभी सौंदर्य कुदरत का, कभी ज्ञान के सागर में डुबोती हूँ

शब्दों के बादल पर बिठा,भावों की बारिश से भी भिगोती हूँ
मैं पुस्तक हूँ……………………………साथ ले लो.

कभी हंसाती ,कभी रुलाती,कभी संजीदा,विचारमग्न करती हूँ
मस्तिष्क के बंद पट को,चुपके-चुपके अहिस्ता से खोलती हूँ
मैं पुस्तक हूँ…………………………….साथ ले लो

भूल जाना ना मुझे कभी, दुःख सुख हर लम्हे में साथ देती हूँ
जहां कोई नहीं तुम्हारा,सिवा तन्हाई के,अपना हाथ देती हूँ
मैं पुस्तक हूँ ……………………………………….साथ ले लो

इस कंप्यूटर युग में तो जैसे, बनती जा रही मैं डूबती कश्ती हूँ
फट जाऊं,गल जाऊं फिर भी, रहूँ स्मृति में, एक ऐसी हस्ती हूँ
मैं पुस्तक हूँ……………………………साथ ले लो

चित्र गूगल साभार

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