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जहां दिवाली में अली ;रमजान में है राम

Posted On: 9 Oct, 2015 Others में

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yamunapathak

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जहां दिवाली में अली रमजान में है राम
इससे बड़ा संसार में कौन सा है धाम

PicsArt_1444763572501दोस्तों फक्र है मुझे अपनी सर ज़मीं पर जहां हिन्दू मुस्लिम कौमी एकता की गंगा जमुनी तहज़ीब की कवायद निभाई जाती है .जहां हिन्दू आफताब को जल चढ़ाता है तो मुस्लिम माहताब को देख ईद का पर्व मनाता है.ऐसा है यह हिन्दुस्तान .
आज अभी अभी whats app पर एक पोस्ट पढ़ा
“.जिस तरह से धर्म मज़हब के नाम पे हम रंगों को भी बाँटते जा रहे हैं कि हरा मुस्लिम का और लाल हिन्दू का रंग है ..वह दिन दूर नहीं जब सारी हरी सब्जियां मुस्लिमों की और लाल टमाटर गाजर चुकंदर हिन्दुओं की हो जाएँगी .आगे लिखा है ….अब समझ में नहीं आ रहा कि ये तरबूज किस के हिस्से में आएगा ?ये बेचारा ऊपर से मुसलमान और अंदर से हिन्दू ही रह जाएगा .”
मैंने इस पोस्ट के जवाब में लिखा “ध्यान से देखो तो तरबूज के हरे और लाल रंग के बीच का रंग सफ़ेद है .अर्थात तरबूज तिरंगे का उदाहरण है जो देश की आन बान शान है.अतः तरबूज़ पूर्णतः सेक्युलर है क्योंकि यह तीन रंग का है .अतः यह सबके हिस्से में आएगा .” आप सब ध्यान से सोच कर बताओ क्या लाल रंग के फल हरी पत्तियों के बीच नहीं होते ??क्या वे दोनों मिलकर पेड़ को उपयोगी नहीं बनाते ???क्या उनका वज़ूद पेड़ से अलग हो सकता है ??
सच कहा है किसी ने …
मैं अमन पसंद हूँ मेरे शहर में दंगा रहने दो
मत बांटो मुझे लाल और हरे रंग में मेरी छत पर तिरंगा रहने दो.

और इसके साथ ही हिन्दी फिल्म का प्यारा सा गीत मन में गूंजने लगा….” तू ना हिन्दू बनेगा ना मुसलमान बनेगा इंसान की औलाद है इंसान बनेगा ”
आम जनता जो संवेदनशील और विवेकी है यह बात अच्छी तरह जानती है कि धर्म मज़हब के पहले वे एक इंसान हैं जिनके सामने लाल और हरे रंग के विभेद से ज्यादा महत्व तिरंगे के सम्मान की है .भूख गरीबी बेकारी आतंकवाद नकसलवाद जैसी समस्याओं से जूझता यह वर्ग तब तक इस बात की गहराई को समझता है जब तक वह अकेला होता है .जैसे ही वह भीड़ का हिस्सा बनता है उन्मादी हो जाता है उसका बुद्धि स्तर गिर जाता है वह इतना अविवेकी हो जाता है कि इस बात को समझने को तैयार नहीं होता कि रक्त का रंग सिर्फ लाल होता है जो किसी हिन्दू या मुसलमान का ना होकर एक इंसान का होता है वह इस संवेदना से दूर हो जाता है कि.ना हिन्दू के लिए जीना है ना मुसलमान के लिए जीना है तो बस हिन्दुस्तान के लिए .कैफ़ी आज़मी साहब ने ठीक कहा है….
बस्ती में अपने हिन्दू मुसलमान जो बस गए
इंसान की शक्ल देखने को हम तरस गए .

ईश्वर के द्वारा गढ़े हर इंसान के अंदर वही रक्त है वही मांस वही मज्जा …मनुष्य के द्वारा गढ़े .मंदिर हो या मस्जिद दोनों ही मिट्टी गारे से ही बने होते हैं जब गढ़ते वक़्त कोई भेद नहीं तो फिर यह भेदभाव कब , कहाँ और क्यों जन्म लेते हैं.उत्तर स्पष्ट है.यह कुछ लोगों के निजी स्वार्थ का परिणाम है जो इंसान को धर्म ,जाति ,भाषा में बाँट कर देश की एकता पर प्रश्नचिन्ह लगा देते हैं.सियासत के शह और मात के खिलाड़ी अजीबोगरीब बयानबाजी कर माहौल को और भी गरमा देते हैं.और कुछ नहीं तो अंग्रेज़ों के फुट डालो शाशन करो के नीति की दुहाई देते हैं .क्या अंग्रेज़ों के देश से चले जाने के इतने वर्षों बाद भी हम देश वासियों के नसों में हिन्दू मुस्लिम का विभेदकारी खून खौल रहा है या कि यह रहनुमाओं के गैरजिम्मेदाराना भाषण से उपजी क्षणिक उत्तेजना है जो विवेकियों को भी अविवेकी बना दे रही है.शायर दुष्यंत ने ऐसे ही लोगों के लिए सावधान करते हुए कहा है…

रहनुमाओं की अदा पर फ़िदा है दुनिया
इस बहकती हुई दुनिया को सम्भालों यारों .

दादरी की घटना हो या श्रीनगर में हॉस्टल में जान बूझ कर की गई बीफ पार्टी हो इसके पीछे आम जनता को भड़काने का ही एकमात्र उद्देश्य है. सभी जानते हैं कि पूरे विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है जो मुस्लिमों के लिए सबसे सुकून भरा माहौल देता है.भारत देश की भूमि पर रहने वाले प्रत्येक मनुष्य को यह समझना होगा कि हर परिवार देश समाज की कुछ परम्पराएं अवश्य होती हैं और उनका सम्मान करना उस परिवार समाज और देश से जुड़े हर मनुष्य का परम कर्त्तव्य होता है.भारत देश में माँ का स्थान बहुत महान है.स्त्री कई रूप में होती हैं .पर जब वे माँ बन जाती हैं उनका स्थान घर परिवार समाज देश में सम्मानीय हो जाता है.भारत देश को भी हम भारत माँ पुकारते हैं. नदियां तो बहुत हैं परन्तु भारत देश के लिए गंगा नदी माँ है …पशु कई हैं किसी भी पशु कि ह्त्या उचित नहीं पर भारत भूमि पर .गाय माता सदृश है.किसी का कितना भी बड़ा स्वार्थ हो पर माँ कहलाने वाले विषयों का वह सम्मान करता है…देश से जुडी परम्पराओं का मान रखने में भेदभाव क्यों हो ? जिस मिट्टी पर हम रहते हैं ….जिस देश का नमक खाते हैं ….उस भूमि उस देश के प्रति इतनी वफादारी तो अवश्य रख सकते हैं.
गाय ऋग्वैदिक काल से भारतीयों के लिए महत्वपूर्ण है.गाय के मह्त्व का मूल्य इतना ज्यादा था कि वह मुद्रा की भांति प्रयुक्त होती थी .ऋग्वेद में अनेक स्थलों पर लिखा है कि यह क्रय विक्रय का माध्यम थी.ऋग्वेद में एक स्थान पर इंद्र प्रतिमा का मूल्य १० गाय कहा गया है.ऋग्वेद ४ २५ .१० पर प्रकट होता है कि गाय के बदले में सोम का पौदा खरीदा जा सकता है.याज्ञिक या धार्मिक कार्य करने वाले पुरोहित के दाहिने तरफ खड़ी की जाती थी अतः गोदान को गो दक्षिणा भी कहा गया.ऋग्वेद में गौ वध का उल्लेख यत्र तत्र आतिथ्य सत्कार के लिए मिलता है पर अपनी उपयोगिता के कारण वह शनैः शनैः अबंध्य मानी जाने लगी.ऋग्वेद में अनेक स्थलों पर उसके लिए अबंध्य शब्द का उल्लेख मिलता है.गाय ना मारने योग्य समझी जाती थी.पर एक अल्पसंख्यक समुदाय ही इसे खाता था महाकाव्य काल में भी समाज में मांसाहार का प्रचलन था.पर गौ मांस का कहीं उल्लेख नहीं है.ब्राह्मण समुदाय का एक वर्ग मांसाहारी था.रामायण में अगतस्य ऋषि को मांस भक्षण करते दिखाया गया है (रामायण ३ ११.५०-६४)महाभारत में उतरा के विवाहोत्सव में ब्राह्मणों ने मांस भक्षण किया था (महा.४ – ७२ .२८ )पर ये उदाहरण बताते हैं कि ब्राह्मणों का एक अल्पसंख्यक वर्ग ही मांसाहारी था.महाभारतकार ने कई स्थान पर कहा है “मनुष्य को सदा निरामिषभोजी होना चाहिए “ऋषि मुनि निरामिषभोजी ही प्रदर्शित किये गए हैं.रजोगुणी तथा आखेट प्रेमी क्षत्रियों के लिए मांसाहार स्वाभाविक प्रतीत होता है.जयद्रथ के सत्कार में द्रौपदी ने हिरन,बारहसिंगा,भालू खरगोश विविध पशुओं का मांस पकवाया था .(महा,-३ २६५ १३-१५) ऋषि भारद्वाज ने भरत के सत्कार में मोर बकरा का मांस तैयार करवाया था (रामायण २ ९१ .६७-७० )रामायण में राक्षसों के अलावाऔर कोई भी गौ मांस खाते प्रदर्शित नहीं किया गया है..उत्तरवैदिक काल में शतपथ ब्राह्मण में उल्लिखित है कि गाय और बैल पृथ्वी को धारण करते हैं अतः उनका मांस नहीं खाना चाहिए.(शतपथ ३ १.२.३)गौ मांस धीरे धीरे निंदनीय माना जाने लगा था.सूत्रकाल में भी मांस मदिरा निषेध नहीं था.

अब यह तो स्पष्ट है कि प्राचीन हिन्दू धर्मग्रंथों में भी गौ का मांस सर्वथा वर्जित था .हाँ मांसाहार ज़रूर प्रचलित था .गाय दूध देने लायक ना भी हो तब भी वह बहुत महत्वपूर्ण होती है .उसका मल मूत्र तक व्यर्थ नहीं ….आयुर्वेद में गौ मूत्र औषध के लिए प्रयुक्तहोता है.
धर्म की दुहाई देने वाले अक्सर भूल जाते हैं कि धर्म बहुत ही शुभ्र उज्जवल श्वेत धारणा है जो कई रंगों में होने के बावजूद भी श्वेत ही दिखता है . इस पर लाल हरे रंग के छींटे डालने की कोई ज़रुरत नहीं है.
आखिर अहलाक की मौत का जिम्मेदार कौन है ??यह कोई षड़यंत्र था या सियासत का घिनौना खेल ! मीडिआ को इसे कम से कम कवरेज करना था.ऐसे ही किसी घटना पर शायर खालिद शाहिद का शेर सही लगता है …
वो हादसा तो हुआ ही नहीं
अखबार की जो शहर में कीमत बढ़ा गया
सच ये है मेरे क़त्ल में वो भी शरीक थे
जो शख्सः मेरी कब्र पे चादर चढ़ा गया .

दादरी घटना पर देश की राजनीति गरमा गई है.यह वैमनस्य क्यों फैलाया जा रहा है …इससे किसी का भला ना होगा.इतना जहर इतनी घृणा …नफरत का यह सफर कब तक चलेगा …क्या दोनों पक्ष कभी ना थकेंगे ??? ये कैसी दौरे तरक्की है कि कुरान और गीता दांव पर लग गई है.सच ही कहा था खलील जिब्रान ने …

हम दोस्तों की तरह आते हैं तुम्हारे पास
लेकिन तुम दुश्मनों की तरह टूट पड़ते हो हम पर
हमारी दोस्ती और तुम्हारी दुश्मनी के बीच
एक गहरी दरार है जिसमें सैलाब है खून का
और आंसू बहते हैं बेतहाशा .

हाल के दिनों में साम्प्रदायिकता को अधिक भड़काया जा रहा है.आम जनता से भी गुज़ारिश है कि धर्म के विषयों पर इतने संवेदनशील ना बने .किसी अफवाह को तूल देकर किसी इंसान की हत्या कर देना धार्मिक बात कैसे हो सकती है.शान्ति सौहाद्र विकास की ज़रुरत हर देश काल और परिस्थिति को रहती है.मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे गिरजाघर का अपना मह्त्व है पर इससे भी ज्यादा ज़रुरत गरीबी भूखमरी बेकारी अन्याय शोषण से छूटकारा पाना है.

(ब्लॉग में लिखी सूचनाएं विमल चन्द्र पाण्डेय जी की किताब ‘प्राचीन भारत राजनीतिक तथा सांस्कृतिक इतिहास से साभार )

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