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ढाई आखर "शब्द" का

Posted On: 14 Mar, 2012 Others में

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yamunapathak

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परमपिता परमेश्वर ने मनुष्य को वाणी की अद्भुत सौगात दी है पर इस वाणी को साकार रूप देते हैं “शब्द”ढाई अक्षर से बने इस शब्द में एक जीवन,एक समाज,एक राष्ट्र,एक दुनिया को परिवर्तित करने की क्षमता होती है;कभी यह दवा का काम करता है तो कभी ज़िन्दगी भर के लिए ज़ख्म दे जाता है. संत कबीर ने भी इसके प्रभाव का वर्णन इस दोहे में किया है
“शब्द-शब्द सब कहे,शब्द के हाथ न पाँव
एक शब्द औषध करे,एक शब्द करे घाव”

यह शब्द जहाँ शान्ति लाने की संभावना से भरपूर होता है वहीँ क्रान्ति का सूत्रपात भी बन सकता है इतिहास इस बात का गवाह है कि गलत शब्द प्रयोग करने की लम्हों की खता ने सदियों तक सजा दिलाई है .द्रौपदी ने दुर्योधन पर शब्दों के ही बाण यह कह कर चलाये थे “अंधे का पुत्र अंधा”परिणति महाभारत के युद्ध के रूप में इतिहास के पन्नों पर दर्ज है. एक अन्य उदाहरण राजा पोरस का है .जब सिकंदर से पराजित होने के बाद उन्हें उसके दरबार में बुलाकर पूछा गया“तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार किया जाए?”राजा पोरस ने सिकंदर को बहुत ही चुने शब्दों में उत्तर दिया“जैसा एक राजा दुसरे राजा के साथ बर्ताव करता है”यह उन शब्दों का ही प्रभाव था कि सिकंदर ने उसे जीता हुआ उनका राज्य वापिस कर दिया.
साधारण से दिखने वाले कबीर,नानक,गांधी,कन्फुसियस आदि महापुरुषों में असाधारण योग्यता सही शब्दों से समाज को प्रेरित करने की ही थी जिसे आज भी याद किया जाता है.शिकागो के विश्व धर्मं सम्मलेन १८९३ में जब स्वामी विवेकानंद ने सभा को संबोधित करने के लिए “भाइयों और बहनों” शब्द का प्रयोग किया तो लोग उनके मुरीद हो गए उनका भाषण १३ दिनों तक चला.

पर जिस शब्द की इतनी शक्ति हैउसके प्रयोग के समय हमें किन मुख्य बातों का ध्यान रखना चाहिए;यह एक विचारणीय प्रश्न है.दरअसल शब्द के चुनाव में व्यक्ति विशेष,स्थान,परिस्तिथि,वक्त सभी तत्वों का ध्यान रखना चाहिए यह ठीक ही कहा जाता है “it is good to speak the truth even if it is bitter but it is better if the speech is both truthful and beautiful “
हमारे एक मित्र हैं बेहद नेक दिल और सुशिक्षित हैं उनके स्थानान्तरण की विदाई समारोह था,जैसा कि अक्सर इस अवसर पर होता है कि हर व्यक्ति ने उनके और उनकी धर्मपत्नी के लिए कुछेक दो शब्द,कुछ गीत प्रस्तुत किये.जब मेरी बारी आई तो मुझे उनकी धर्मपत्नी के साथ बिताये एक ग़ज़ल कार्यक्रम की याद आयी जिसमें उन्होंने पंकज उधास के गाये ग़ज़ल”चांदी जैसा रंग है तेरा,सोने जैसे बाल”को अपना पसंदीदा ग़ज़ल बताया था.मैंने उस अवसर पर इस पसंद को ध्यान में रखकर यह ग़ज़ल गाया.वे शक्ल-सूरत से बहुत ही अच्छी हैं हाँ, उनका रंग कुछ दबा सा है पर मेरे ज़ेहन में ये बात आयी ही नहीं थी.जब कार्यक्रम समाप्त हुआ तब उन मित्र ने कहा”मेरी पत्नी का रंग चांदी जैसा नहीं है पर मैं उससे अत्यंत प्यार करता हूँ”मुझे बात समझ में नहीं आयी जब घर आकर उस कार्यक्रम की vedeo recording देखा तो शब्दों का गलत चुनाव स्पष्ट था .मेरी भूल यह थी कि मैंने अपने वक्तव्य में कहा था”मैं mam के लिए यह ग़ज़ल पेश कर रही हूँ”जबकि मुझे कहना था “मैं mam की पसंद को ध्यान में रखते हुए यह ग़ज़ल पेश कर रही हूँ”हमारे रिश्ते में भी इस घटना से थोड़ी खटास आ गयी जबकि ये अनजाने में हुई भूल थी
उत्तर प्रदेश में एक कहावत है कि शब्द पहले बात में प्रयोग होते हैं,फिर वे बतरस बनते हैं,और फिर बतंगड़ जिसका परिणाम बतकही के रूप में विकराल हो जाता है

महत्वपूर्ण पदों पर आसीन व्यक्तियों द्वारा गलत शब्द का चुनाव तो और भी अधिक घातक होता है ,कभी-कभी तो यह विप्लव की हुंकार सा बन जाता है.उपयुक्त शब्दों का प्रयोग ही अभिव्यक्ति की शक्ति को सार्थक बनाता है.

हम सब भी इस ढाई आखर “शब्द” का सही प्रयोग कर इश्वर के दिए अद्भुत वाकशक्ति को सार्थक अभिव्यक्ति दें.

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