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दो अक्षर पढ़कर बच्चे भी,हम जैसे हो जायेंगे(jagran junction forum )

Posted On: 23 May, 2012 Others में

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yamunapathak

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Copy (2) of SDC13558सोच इतनी सतही ना करो कि फैसले कमज़ोर पड़ जाएँ “

NCERT की ११वी कक्षा की राजनीतिशास्त्र के विषय की पाठ्यपुस्तक में शामिल किये गए कार्टून पर गहराए विवाद ने  इस विधा में किये जाने वाले नए-नए प्रयोगों पर सवालिया निशाँ छोड़ दिया है.१९४९ में शंकर पिल्लई जी के द्वारा बनाए गए इस कार्टून पर उपजे विवाद ने लोकसभा में बहस का रूप लिया और पाठ्य पुस्तकों में सांसदों,राजनेताओं और राजनितिक प्रक्रिया पर व्यंग करने वाले तमाम कार्टून को निकालने की बात कही गयी.सर्वाधिक हास्यास्पद और साथ ही सशंकित करने वाली बात यह रही कि तमाम बिल और सलाहों को मानने से पहले लम्बी चर्चा करने के आदी लोगों ने इसे हटाने की बात पर त्वरित सहमति दिखाई.इस पुरे प्रकरण पर एक मशहूर शेर सुनाती हूँ .
बच्चों के नन्हे हाथों को चाँद -सितारे छूने दो
दो अक्षर पढ़कर ये भी हम जैसे हो जायेंगे

सर्वप्रथम प्रश्न उठता है कि तमाम प्रयोगों के मद्देनज़र जब इन कार्टून को कक्षा ९ से १२ तक के किशोर वय के विद्यार्थियों की पाठ्य पुस्तकों में स्थान दिया जा रहा था तो तत्कालीन तर्क क्या थे?उन तर्कों की कसौटी पर आज इस विवाद को क्यों नहीं सुलझाया जा रहा ? क्या उस वक्त की यह प्रयोगधर्मिता राजनेताओं के इतने खिलाफ थी कि उस समय इन कार्टूनों पर सूक्ष्मता से अध्ययन करना भी मुनासिब नहीं समझा गया?फिर तो “मर्ज़ बढ़ता जाए ज्यों-ज्यों दवा की” की कहावत को चरितार्थ करते हुए शिक्षा पर किये गए प्रयोगों पर रोज़ विवाद उठेंगे.२००५ में नेशनल curriculam framework ने तीन बातों पर विचार किया था———–curriculam framework ,syllabus preparation और textbook writing .एक शिक्षाशास्त्री ने प्रश्न भी रखा था “Is society composed of structure and webs of social relationships or is it a basket of descrete and seperate identities that requires accomodation?”नेशनल मोनिटरिंग कमिटी ने इन पाठ्य पुस्तकों को approve किया था.१५ राज्यों में पिछले ५ वर्षों से ये पढाये जा रहे हैं.
Copy (2) of SDC13557विचार विमर्श के बाद जब इन्हें स्थान दिया गया तो आज एक कार्टून की सतही व्याख्या से सारे कार्टून हटाने का निर्णय किसी भी नज़रिए से परिपक्वता नहीं दर्शाता.श्री प्रणव मुखेर्गी ने तो यह भी कह दिया“कार्टून परिपक्व मस्तिष्क के लिए हैं;बच्चों के लिए नहीं”मुझे आश्चर्य और चिंता है की क्या कुछ दिनों बाद टी.वी के अलग-अलग चैनल में दिखाए जाने वाले हँसते -हंसाते कार्टून वाले विज्ञापन,कार्यक्रम भी तो नहीं बंद हो जायेंगे!!!!!!!!!अगर ऐसा है तो फिर बच्चों को समय से पहले ही मायूस,नीरस और बुजुर्ग बनाने की कवायद हो शुरु गयी है.इस तरह तो एक दिन अखबार,पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाले कार्टून भी विवादास्पद घोषित कर दिए जायेंगे और मासूम हास्य भाव समेटे संजीदगी से सन्देश देने वाला अभिव्यक्ति का यह सशक्त माध्यम ही सदा के लिए विलुप्त हो जाएगा.जीवन से हास्य बोध , हास्य भाव दोनों ही समाप्त हो जायेंगे;;;;; शेष रह जायेगी नीरसता.सच पूछिये तो प्रजातंत्र के साथ एक खेल खेला जा रहा है मानो वह फुटबाल हो ,जिससे कई दलों के खिलाड़ी खेल रहे हैं ,जीत किसी की भी हो,उछाली तो गेंद ही जा रही है,पैरों के प्रहार तो वो ही झेल रही है.प्रजातंत्र का फुटबौल घायल हो रहा है .

अब इस कार्टून की जिस तरह से व्याख्या की गयी उस पर  विचार करती हूँ.यह सही है कि ११वी कक्षा के विद्यार्थी नन्हे बच्चे जैसे मासूम नहीं होते पर इतने परिपक्व भी नहीं होते कि कार्टून देखकर इतने विचलित हो जाएँ जैसे हमारे नेता हो रहे हैं.रिपब्लिकन पार्टी के रामदास अठावले जी ने ही सर्वप्रथम यह विवाद उठाया.मेरी जानकारी में किसी विद्यार्थी या उनके शिक्षक ने यह विवाद नहीं उठाया क्योंकि शिक्षक जब अपने विद्यार्थी को शिक्षा देता है तो पहले विषय का उज्जवल पक्ष रखने की कोशिश करता है और सतही व्याख्या से परे गहराई से उस विषय को समझाने की कोशिश करता है.इस कार्टून में भी किसी व्यक्ति विशेष की योग्यता पर प्रश्न चिन्ह लगाने की व्याख्या एक शिक्षक कर ही नहीं सकता.व्याख्या करने वाले अति संवेदनशील भीड़तंत्र बच्चों को बचपन से पढाये जाने वाले ,पीढी दर पीढी संवाहित कहानी “खरगोश और कछुआ “को विस्मृत कर बैठा.इस कहानी का सन्देश था”SLOW AND STEADY WINS THE RACE”यह भारतीय संविधान के पिता आंबेडकर जी और ऐसे कई नेताओं के धैर्य और अथक प्रयास का प्रतीक है ,यहाँ snail  धीमेपन का प्रतीक है जो अम्बेडकरजी के लिए नहीं बल्कि संविधान निर्मित होने के धीमेपन को इंगित कर रहा है. चाबुक और ऐसी कई चीज़ें महज़ प्रतीक के तौर पर प्रयुक्त होती हैं जो मेरी व्याख्या में तत्कालीन भारत की अस्थिरता का द्योतक है क्योंकि भारत देश जल्द ही अंग्रेजों की गुलामी से आज़ाद हुआ था.इस अस्थिरता के झंझावातों से विचलित हुए बिना हमारा संविधान अन्य देशों के संविधान की कुछ विशेषताओं को भी समाहित करता हुआ धैर्यपूर्ण माहौल में सृजित हो रहा था इसे पूर्ण होने में २ वर्ष,११ महीने,१८ दिन लगे पर यह पुरे विश्व के संविधान से विस्तृत,लिखित और बेहतर बना.

Copy of SDC13560सन २००५ में Danish अखबार Jyllands पोस्टर में पैगम्बर मुहम्मद के कार्टून पर अन्तराष्ट्रीय विवाद उठा था क्योंकि मुस्लिम समुदाय पैगम्बर के चित्रात्मक प्रस्तुतीकरण को इस्लाम धर्मं के प्रतिकूल मानता है.विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत देश में कार्टून विधा पर यूँ भी संकट के बदल गहराते रहे हैं क्योंकि यहाँ कोई भी व्यक्ति स्वयं पर व्यंग या उपहास ज़रा भी बर्दाश्त नहीं करता.प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट आर. के.लक्षमण ने अपनी पुस्तक ‘Tunnel of time ‘में बताया है कि इन्होने एक कार्टून बनाया था जो कि ऊँची हील पहने एक महिला का कार्टून था जिसे इंदिरा जी का उपहास मान लिया गया था और मुझे चेतावनी दी गयी थी कि अगर इस तरह के कार्टून बनाना जारी रखा तो मुझे इसके लिए पछताना पड़ सकता है .उनकी पत्नी का कहना था कि लक्षमण जी इस बात से अत्यंत दुखी हुए और लम्बी छुट्टी में मौरिशश चले गए.१९९३ में अयोध्या घटना के उपरान्त मंजुल नामक कार्टूनिस्ट ने आडवानी जी पर एक कार्टून लखनऊ के स्थानीय अखबार में दिया था तब भाजपा के एक नेता ने इस अखबार की प्रतियां जला दी थीं. पर राजनीतिशास्त्र की पाठ्य पुस्तकों में राजनेताओं,राजनितिक प्रक्रिया से सम्बंधित कार्टून का शामिल करना पाठ को बोधगम्य बनाने के मकसद से है नाकि नेताओं की अस्मिता पर प्रश्न उठाने के लिए.सामाजिक अध्ययन की शिक्षिका होने के नाते यह जानती हूँ कि इन विषयों की कक्षा विद्यार्थियों के लिए बोझिल और नीरस हो जाती है.अतः CHALK और TALK दोनों के साथ पाठ रखना पड़ता है ब्लैक बोर्ड पर चित्र बनाकर समझाना होता है.वर्त्तमान आधुनिकीकरण परिदृश्य में लम्बे भारी भरकम शब्दों के रेगिस्तान में ,ज्ञान की मरीचिका को पाने की ज़द्दोज़हद में भटकते विद्यार्थियों के लिए ये कार्टून,चित्र जैसे दृश्य सामग्री मरूद्यान से हैं.जो उन्हें राहत और सुकून देते हैं,उनकी ज्ञान पिपासा को तृप्त करते हैं.हाँ यह ज़रूर ध्यान में रहे कि व्यंग अति कटु न हो तथा कार्टून में छुपे व्यंग की व्याख्या भड़काऊ ना होने पाए.

शिक्षा मानव को सार्थक अस्तित्व के लिए सीखने का दृष्टिकोण प्रदान करती है.शिक्षक की कोशिश भी विद्यार्थी में निहित कौतुहल,जिज्ञासा ,सीखने की इच्छा को बलवती बनाना होता है.पाठ से सम्बंधित चित्र ,कार्टून जैसे दृश्य साधन विद्यार्थियों की मानसिक शक्तियों की सक्रियता को बढ़ाकर अधिक चिंतन-मनन,विशलेषण और परीक्षण में सहायक हो जाते हैं और पाठ रुचिकर,बोधगम्य और स्थायी रूप से प्रभावी हो जाता है.हम ३ R ‘S में READING ,WRITING ,ARITHMETIC की बात कर लेते हैं पर 4th R——– REASON भी ज़रूरी है यह भूल जाते हैं.किस अपरिपक्व मस्तिष्क या impressionable mind की बात नेतागण कर रहे हैं;.कहावत है कि बुद्धिमानी का उम्र से कोई सम्बन्ध नहीं होता है उम्र के साथ-साथ बुद्धिमानी नहीं cunningness बढ़ती जाती है,किशोर वय अपनी उम्र के अनुसार सूचना और व्याख्या की आशा रखता है.वह सिनेमा ,नाटक के कल्पना जगत और अपने आस-पास के वास्तविक जगत में कई समस्याएं ,घटनाएं देखता है सैकड़ों प्रश्न उसके मस्तिष्क में बिजली की मानिंद कौंधते हैं ठीक मुन्नी-उन्नी की तरह,ऐसे में लम्बे-लम्बे नीरस व्याख्यान सुनकर वह अपनी जिज्ञासा शांत नहीं कर पाता उसे उदाहरण ,हलके हास्य से भरे कार्टून चित्र आकर्षित करते हैं.वह मनन,चिंतन कर उन्हें रोज़मर्रा की ज़िन्दगी से जोड़ता है,समाधान खोजता है.एक किशोर वय का विद्यार्थी अखबार पढता है,टी.वी के समाचार देखता है ,वह सिर्फ किताबों की दुनिया तक ही सिमटा नहीं रहता, फिर क्या उसकी अपरिपक्वता (impressionable mind )का हवाला देकर संचार के सभी माध्यमों से कार्टून हटाने होंगे?इसे मैं तो बेहद अदुरदर्शी सोच मानती हूँ.विद्यार्थियों से जुडी कई समस्याएं आज भी ज्यों की त्यों सुरसा की तरह मुख खोले उनके भावी कल को निगलने के लिए तैयार है,बेहतर होता कि हमारे संवेदनशील,दूरदर्शी नेतागण उस सुरसा का दमन कर
भारत वर्ष के भविष्य की हिफाज़त करते.बच्चों के खेल की तरह पहले रेत का महल बनाना और फिर गिरा देना, यह निहायत ही अदुरदर्शी और अपरिपक्व कदम है .
कक्षा १० की राजनीति शास्त्र की पाठ्य पुस्तक में पृष्ठ ४९ में धर्मनिरपेक्षता से सम्बंधित,पृष्ठ ५३ में vote बैंक की राजनीति से सम्बंधित,पृष्ठ ६२ में गरीबी हटाओ और फील गुड के कटु सत्य से सम्बंधित,पृष्ठ ९० में ज्वलंत प्रश्न ( भाषा विवाद,पृथक राज्य की मांग,पुलिस ज्यादती के विरोध में प्रदर्शन,सीमा विवाद)जैसे पत्थरों की प्रजातंत्र पर प्रहार,पृष्ठ ९५ गरीबों की आवाज़ प्रजातंत्र में किस तरह बंद है पर आधारित कार्टून किसी राजनेता पर प्रश्न नहीं उठाते पर राजनीति की तस्वीर ज़रूर स्पष्ट करते हैं और एक किशोर वय के विद्यार्थियों को इसकी जानकारी होनी चाहिए.Education implies having openness towards all points of view,the young must know that there are many dimensions of any issue.
शिक्षा का उद्देश्य बच्चों को एक जागरूक नागरिक बनाना है और किशोरावस्था इसके किये उपयुक्त शुरुआत है.ध्यान रखने वाली बात यह है कि किसी भी विषय की व्याख्या उनके समक्ष किस तरह की जा रही है.

Copy of SDC13559इन कार्टून को देखकर आहत होना निहायत बचकानी सी बात है प्रसंशा के पुष्प के साथ आलोचना के कांटे भी स्वीकार करने के लिए तैयार होना चाहिए.गुलाब काँटों के बीच भी मुस्कराता है,काँटों का अस्तित्व उसके पूर्ण विकास में कभी बाधक नहीं बनता क्योंकि वह जानता है कि ये कांटे ही हैं जो उसकी रक्षा करते हैं .
निष्कर्षतः इन दृश्य सामग्री को जो कि अभिव्यक्ति की सहज,सरल माध्यम भी है इन्हें पाठ्य पुस्तकों से हटाना बाल मनोविज्ञान केन्द्रित शिक्षा की उपेक्षा और शिक्षा प्रणाली के प्रति असंवेदनशीलता होगी.इन्हें पाठ्य पुस्तकों से हटाने की नहीं सिर्फ पाठ और विषय पढ़ाते और समझाते वक्त इन कार्टून की व्याख्या ,प्रस्तुतीकरण .पाठ और विषय से उचित विधि से तालमेल करने की ज़रूरत है.

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