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भारतीय भाष्करों का सम्मान करो

Posted On: 5 Aug, 2014 Others में

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yamunapathak

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“भारतीय भाष्करों का सम्मान करो;सी-सैट को रद्द करो” 4 अगस्त को लोक सभा में सदन की कार्यवाही के दौरान यही नारा गूंजता रहा और सदन की कार्यवाही 12:30 बजे से 2 बजे तक स्थगित रही .

५ अगस्त को सरकार ने यह फैसला लिया कि अंग्रेज़ी भाषा के आठ नौ प्रश्न जो 22 अंक के होते हैं वे मेरिट में जोड़े नहीं जाएंगे . हालांकि सरकार के इस निर्णय से आंदोलनकारियों में कोई संतुष्टि नहीं है .कुछ नेताओं ने भी सरकार के निर्णय से असहमति दिखाई है .प्रारम्भिक परीक्षा की तिथि 24 अगस्त है और इतनी जल्दी प्रश्न पत्र में परिवर्तन लाना या फिर परीक्षा निरस्त करना या उसे आगे की तिथि में करना बहुत कठिन है .यह समय और संसाधन का अपव्यय होने के साथ उन कई प्रतिभागियों के लिए अनुचित है जिन्होंने सी सैट पैटर्न पर ही परीक्षा की तैयारी की है.

सिविल सेवा में जाना लगभग प्रत्येक युवा का स्वप्न होता है हालांकि वर्त्तमान में कुछ लाभकारी क्षेत्रों की ओर युवा ज्यादा रूझान रखते हैं फिर भी सिविल सेवा की परीक्षा एक बार कोशिश ज़रूर करते हैं मैं भी कभी उन्ही युवाओं में शामिल थी .आज जब इस परीक्षा के सी सैट पर विरोध के स्वर तेज हो रहे हैं तब यह विश्लेषण ज़रूरी है कि विरोध क्यों और उसे रोकने के लिए क्या किया जाए .

 

दरअसल यह परीक्षा वास्तव में कठिन ही होती है जो उच्च और गहन स्तरीय ज्ञान बोध विश्लेषण क्षमता की मांग करती है जो बिलकुल जायज़ भी है, ऐसा ये आंकड़े बताते हैं .सन 2009 में 4,09,110  अभ्यर्थियों ने सिविल परीक्षा का फॉर्म भरा ,जिसमें 1,93,091  अभ्यर्थी ही प्रारम्भिक परीक्षा में उपस्थित हुए.इसमें से मुख्य परीक्षा में सिर्फ 6% अर्थात 11,894  योग्य प्रतियोगी ही पहुँच पाये और मुख्य परीक्षा के परिणाम के अनुसार सिर्फ 18 % (2136) सफल प्रतियोगी इंटरव्यू (व्यक्तिगत परीक्षा )के लिए चयनित हुए और अंत में .मुख्य परीक्षा और इंटरव्यू के आधार पर सफल होने वाले प्रतियोगियों में 791 को विभिन्न पदों पर नियुक्ति का अंतिम निर्णय पूरा हुआ .

सन 2011 में 4,72,290 प्रतिभागियों ने सिविल सेवा परीक्षा के लिए ,फॉर्म भरा ,2 ,43 ,003 प्रतियोगी ही परीक्षा में उपस्थित हुए मुख्य परीक्षा के लिए 11984 प्रतियोगी ही सफल हो पाये ,और 2417 प्रतियोगियों ने इंटरव्यू के लिए सफलता पूर्वक स्थान पाया अंततः कुल 910 सफल प्रतियोगियों को आई ए एस, आई एफ एस , आई पी एस ,आई आर एस और अन्य सेवाओं के लिए नियुक्ति मिल पाई.एक बात गौर तलब यह भी कि 2011 की इस प्रतियोगी परीक्षा में प्रथम प्रयास में ही परीक्षा में सफल होकर दूसरे स्थान पर रहने वाली रुकमणि रैर ने मास्टर ऑफ़ आर्ट्स की डिग्री ली है.

सी सैट 2001  में ही अनुमोदित था जिस पर बाद में 2008  में ध्यान दिया गया .2001  में केंद्रीय मंत्री रहे वाई के अलघ का कहना था “दरअसल सी सैट को ग्रामीण शहरी विभेदकारी परीक्षा समझना ही गलत है.अंग्रेज़ी भाषासे सम्बंधित प्रश्न सिर्फ साधारण स्तर की अंग्रेज़ी से सम्बंधित ही होते हैं.”

कोठारी समिति 1976 के आधार पर निर्धारित तीन दशकों से चली आ रही वैकल्पिक विषय के प्रश्न पत्र की जगह 2012 से सी सैट ने ले ली है.2011 तक प्रारम्भिक परीक्षा के लिए 23 लिस्टेड विषयों से कोई एक विषय अभ्यर्थी चुन सकता था जो 300 अंकों का प्रश्न पत्र होता था .दूसरा प्रश्न पत्र सामान्य ज्ञान का 150 अंकों का होता था इस सामान्य प्रश्न पत्र में हे 15-20 अंकों का प्रश्न कौशल और तर्क आधारित होता था .नई नीति के तहत (सी सैट ) सी सैट प्रश्न पत्र 200 अंकों के होते हैं.

अब विरोध का प्रथम तर्क अंग्रेज़ी भाषा को लेकर है.जो कि कक्षा दसवीं के स्तर के होते हैं .एक प्रशासनिक अधिकारी के लिए कम से कम साधारण अंग्रेज़ी का ज्ञान ज़रूरी है. आज चूँकि अंग्रेज़ी बाज़ारू होती जा रही है एस एम एस की भाषा ने अंग्रेज़ी के अपेक्षित ज्ञान को भी बिगाड़ दिया है .great  अब   g8 हो गया है तो fine    f9 और for   4 हो गया है ऐसे प्रचलन में अच्छे इंग्लिश मीडियम में पढने वाले विद्यार्थी भी शुद्ध व्याकरण और सही शब्द भण्डार से वंचित हो जाएंगे .पहले गाँव और शहर दोनों ही क्षेत्र के विद्यालयों में जिस तरह से शुद्ध व्याकरण के ज्ञान देने के साथ अंग्रेज़ी पढ़ाई जाती थी आज इसका बहुत हद तक अभाव होने लगा है..सिविल सेवा की परीक्षाएं प्रत्येक दिन घंटों अध्ययन की मांग के साथ व्यवहारिक ज्ञान की भी मांग करती हैं मेहनत का कोई विकल्प नहीं होता है.अपनी क्षमता को पहचान कर यथोचित तैयारी ज़रूरी है.

दूसरी बात यह कही जा रही है कि तर्क ,विश्लेषण, समस्या समाधान, निर्णय क्षमता ,सामान्य मानसिक योग्यता ,आधारभूत गणना,से जुड़े प्रश्न इंजीनियरिंग के विद्यार्थी आसानी से कर लेते हैं .यह सच भी है जे ई ई के प्रश्न पत्र ऐसे होते हैं कि प्रतियोगी समय प्रबंधन के साथ तार्किक विश्लेषणात्मक प्रश्नों को हल कर सटीक उत्तर देने में सक्षम हो जाता है .पर वह इसके लिए तैयारी भी करता है.एक प्रशासनिक अधिकारी स्थिति के अनुसार तार्किक विश्लेषण कर सके और निर्णय लेने में सक्षम हो यह अपेक्षित है.और वैसे भी इंटरव्यू के वक़्त तो ऐसे कई प्रश्न किये जाते हैं .सरकारी विद्यालयों में जहां रटंत विद्या उपलब्ध कराई जाती है वहां तार्किक क्षमता,निर्णय शक्ति,समस्या निवारण,बौद्धिक क्षमता से जुड़े अध्ययन की बात ही बेमानी है यह हमारी सरकारी विद्यालयों की शिक्षा व्यवस्था की खामी है जो अंग्रेज़ी को अन्य विषयों की तरह गंभीरता से नहीं लेती हालांकि केंद्रीय विद्यालयों और नवोदय जैसे विद्यालयों में बच्चे सफल अध्ययन करते हैं..मुझे याद है मेरे एक रिश्तेदार के दो बेटों ने यह परीक्षा दी थी और सफल हो कर आज नियुक्त भी हो गए हैं वे कुछ यादें बताते थे कि उनके दोस्तों ने उन्हें कुछ अजीब से प्रश्न के लिए भी तैयार होने को कहा था.जैसे ,प्रतियोगी से पूछा गया ,पंखे में कितने ब्लेड हैं .”साधारणतः हम कह सकते हैं “तीन “पर उन्होंने चपरासी को बुलाया ,पंखा बंद करने को कहा और जब पंखे की गति रूकी तब देख कर कहा “तीन”अर्थात वे जिस पोस्ट के लिए गए थे, उनसे तथ्यों को सटीक निरीक्षण अपेक्षित था .साथ ही एक अधिकारी के निर्देशन देने का गुण भी अपेक्षित था जो उन्होंने स्वयं पंखा ना बंद कर चपरासी को बुला कर प्रदर्शित कर दिया .एक दूसरे प्रश्न में था तुम कितनी सीढ़ियां चढ़ कर इंटरव्यू रूम तक आये हो ? साधारण अभ्यर्थी अचकचा जाए .पर उन्होंने शांत हो कर कहा ,”घर से निकलते वक़्त आपकी पत्नी जी ने जितनी चूड़ियाँ पहनी थीं बस उतनी ही सीढ़ियां चढ़ कर आया हूँ .” यह सही भी है कोई सीढ़ियों कि गिनती नहीं करता पर यह भी सही है कि घर से निकलते वक़्त कई बातों पर हमारा भी ध्यान नहीं जाता .अब यह भले ही हंसी ठिठोली के रूप में उनके दोस्तों ने बताया हो पर यह सच है कि तार्किक प्रश्न का सामना इंटरव्यू में करना ही पड़ता है.और अर्जुन द्वारा मछली की आँख की तरह जिस ने एक ही लक्ष्य सिविल सेवा में जाने का लिया हो वह तो प्रारम्भ से ही सम्पूर्ण तैयारी करेगा .तार्किक ,विश्लेषण, निर्णय क्षमता शिक्षा का अहम अंश है एक आधारभूत कौशल उससे इंकार नहीं किया जा सकता है.

प्रतियोगियों के यह तर्क कि मेडिकल और इंजीनियरिंग के अभ्यर्थी को सी सैट लाभ पहुंचा रहा है यह तर्क इसलिए अस्वीकार्य है कि 2008  में जब सी सैट नहीं था तब भी मुख्य परिक्षा में स्नातक प्रतियोगियों में मानविकी विषयों में जहां सफलता प्रतिशत दर 5.6 % थी विज्ञान विषयों के प्रतियोगियों की 4.2% मेडिकल 13%,इंजीनियरिंग 9.8 % थी .वहीं परास्नातक प्रतियोगियों में मानविकी 6.1%,विज्ञान विषयों से 6.4%, मेडिकल में  10.6 %,इंजीनियरिंग 13.1 % सफलता दर रही थी.एक बात ज़रूर थी कि वैकल्पिक विषयों में मानविकी विषयों से परीक्षा देने वालों की सफलता का दर प्रारम्भिक परीक्षा में अच्छा रहता था.कुछ वर्ष तो विज्ञान इंजीनियरिंग और मेडिकल शाखा से जुड़े प्रतियोगी अपने विषय ना चुन कर मानविकी विषयों से परीक्षा देना (क्रॉस डोमेन शिफ्ट) पसंद करने लगे थे.

सी सैट को कायम रखने या हटाये जाने के तर्क के रूप में कुछ बिन्दुओं पर चर्चा मुनासिब है …………

१ ) जिस उद्देश्य प्राप्ति के लिए सी सैट लागू किया गया था क्या उन उद्देश्यों की पूर्णतः प्राप्ति हो पाई हाँ, तो सी सैट उचित है अगर नहीं तो उसमें बदलाव की ज़रुरत है

२ ) एक ऐसी परीक्षा जिसमें देश के प्रत्येक तबके के युवा बिना भेद भाव के उपस्थित होते हैं क्या उसे बहुत कठिन करना जायज़ है अगर हाँ तो फिर

विद्यालयों की शिक्षण व्यवस्था को भी उसके स्तर का ही किया जाए.

३ )राजनीति को पर रखकर इस समस्या पर विचार किया जाए .

४) अब तक के चयनित प्रशासनिक अधिकारियों में से उत्तम सेवा देने वाले कुछ अधिकारियों/लोक सेवकों को भी चर्चा में शामिल कर निर्णय लिया जाए .ताकि उनके अनुभवों से इस दिशा में सही निर्णय लिया जा सके

भारत देश में प्रशासनिक सेवा में जाने का रूझान प्रत्येक युवा को होता ही है .ऐसे में प्रतियोगियों की संख्या को देखते हुए और परीक्षा को समकालीन वैश्विक गाँव की अवधारणा पर खरा उतारने के लिए सी सैट का पैटर्न अपनाना ज़रूरी है .कुछ विशेष विषयों के ज्ञान की परीक्षा से ज्यादा ज़रूरी तर्क,विश्लेषण जैसी क्षमताओं का परीक्षण है जो परीक्षा प्रारूप को एकरूप भी बनाते हैं और सेवा से जुड़े सॉफ्ट स्किल को भी जाँच पाते हैं. गौर तलब बात यह है कि भारत में जहां शिक्षण व्यवस्था में आर्थिक ,क्षेत्रीय,भाषायी आधार पर विषमता है वहां प्रतियोगी परीक्षाओं को सभी विषमताओं को ध्यान में रख कर आयोजित किया जाए या फिर शिक्षण व्यवस्था को एकरूप बनाया जाए. समय के अनुसार प्रत्येक सभ्यता संस्कृति परिवेश में परिवर्तन होता है .और फिर तर्क,विश्लेषण,निर्णय क्षमता जैसे कौशल प्राचीन काल से शिक्षा में अपेक्षित हैं .नालंदा विद्यालय में प्रवेश परीक्षा ही सात या आठ द्वारों पर एक एक कर ली जाती थी.एक द्वार पर प्रश्नों के सही संतोष जनक उत्तर होने पर ही अगले द्वार में पहुँच हो पाती थी.आज शिक्षा व्यवस्था में सुधार की बेहद ज़रुरत है .ना कि प्रतियोगी परीक्षाओं के स्तर में गिरावट की .भाषा समयानुसार बदलती रही .पाली से संस्कृत और फिर संस्कृत से हिन्दी तक आई.सच पूछिए तो हिन्दी भाषियों की शिकायत से ज्यादा तो अन्य क्षेत्रीय भाषा वालों की परेशानी हो सकती है पर प्रत्येक भाषा के प्रतियोगियों को अपनी भाषा के साथ अंग्रेज़ी का कम से कम साधारण स्तर का ज्ञान आवश्यक है . इतिहास गवाह है कि राजा अपने सलाहकार भी ऐसे वैसे को नहीं रखता था उसके लिए भी चयन और परीक्षण प्रणाली थी जितना तार्किक ,बुद्धिमान ,विश्लेषक सलाहकार उतना ही व्यवस्थित प्रशासन होता था .आज भी अकबर को बीरबल की ही ज़रुरत है …और कृष्णदेवराय को तेनालीराम की…. फिर आज हम क्यों ना अपने प्रशासकों को उन सारे गुणों से भरपूर पाएं.
इस लिए सिविल सेवा के लिए तर्क ,विश्लेषण,मानसिक योग्यता ,निर्णय क्षमता ,भाषा ज्ञान ,अंतर्वैयक्तिक सम्बन्ध कौशल के साथ साथ ईमानदारी, नैतिकता ,प्रलोभन से दूर रहने वाले टेस्ट भी अपेक्षित है.

सदन में नारे लगाते माननीयों से यही अनुरोध है कि वे शिक्षा के आधार को मज़बूत बनाएं .भारतीय भाष्कर प्राचीन काल से चमक रहे हैं उन्होंने अपनी तेज का परिचय सदा दिया है .बदलते वक़्त के हर कदम के साथ ताल मिला कर चलने के लिए युवाओं को प्रोत्साहित किया जाए .प्रशासक जितने योग्य और वक़्त की मांग के अनुसार तैयार होंगे उतना ही तेज लिए वैश्विक गगन में भारत भाष्कर बन कर पूरे जग को रोशन करेगा यही भारत का सम्मान है और भाष्करों का भी सम्मान है.

प्रत्येक प्रतियोगी को बहुत सारी शुभकामना

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