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माँ, तेरी थाली की सब्जी में इतनी तरी क्यों ?? Contest

Posted On: 27 Mar, 2017 Others में

V2...Value and Visionextremely CRUDE ; completely PURE

yamunapathak

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किसी भी मनुष्य के साथ जाति , लिंग ,भाषा ,धर्म या किसी भी तरह का भेदभाव करना बेहद अमानवीय है .परंतु अगर यह भेदभाव किसी और द्वारा नहीं बल्कि स्वयं से ही किया जाए तो इसे हम किस तरह देखें …. किस पर क्षुब्ध होएं…आवाज़ किसके विरूद्ध उठाएं …. सज़ा किसे दें ???
स्त्री और पुरुष के लिए जब कभी अधिकार और कर्त्तव्य की बात होती है न्याय के तराज़ू का पलड़ा बेहद असंतुलित हो जाता है .स्त्री के परिप्रेक्ष्य में जहां कर्त्तव्य का पलड़ा इतना भारी कि ज़मीन चूम ले वहीं अधिकार का पलड़ा इतना हल्का कि आसमान में उड़ जाए और पुरुष के लिए इसका ठीक विपरीत .हैरानी तो तब होती है जब अधिकार और कर्त्तव्य के इस अस्वीकार्य असंतुलन या भेदभाव को स्त्रियां ही स्वयं के लिए सहर्ष चुन लेती हैं .

मैं जो अनुभव अभिव्यक्त करने जा रही हूँ वह मेरी ही नहीं हम में से कई साथियों की कहानी होगी .मैंने बचपन से ही अपनी माता जी को स्वयं से ही लैंगिक भेदभाव करते देखा है .वे हमेशा स्वयं को पापा से कम आंकलन करती थीं .दिन भर ऑफिस रहने वाले पापा उनका ध्यान रखते थे पर वे यह समझ नहीं पाते थे कि उनकी पत्नी क्यों कभी उनके साथ भोजन नहीं करती हैं.सारे पौष्टिक आहार पापा के भोजन की थाली में होते थे .दही के बगैर लंच नहीं ..दूध के बगैर डिनर नहीं …जब वे माँ से पूछते ,”खुद के लिए भी रखा है ना ?” वे मुस्करा कर हाँ में सर भर हिला देती थीं.मुझे जाने क्यों पापा पर थोड़ी नाराज़गी भी होती थी कि वे कभी स्वयं ही रसोई घर का मुयाअना क्यों नहीं करते … क्या सच का उन्हें पता नहीं या सच का सामना करने का साहस नहीं था !! क्या यह प्रश्न माँ के साथ औपचारिकता भर होती थी क्या सच में उन्हें माँ के द्वारा स्वयं के ही प्रति भेदभाव की भावना उद्वेलित नहीं करती थी  ? पापा और सभी बच्चों को भोजन देने के बाद ही वे भोजन ग्रहण करती थीं .किसी दिन उनकी सब्जी दाल में बहुत ज्यादा तरी होती थी … कभी कभी तो बगैर सब्जी के ही रोटी खाती .मुझे समझ नहीं आता था हमारी थाली की सूखी सब्जी.. गाढ़ी दाल उनकी थाली में आकर इतनी तरी वाली क्यों हो जाती थी .जब मैं कहती ,”माँ सब्जी ख़त्म हो गई तो फिर से बना लो .”उनका सीधा सा ज़वाब होता था ,”बिटिया तोहरे लोगन खाय लेहलू हमार पेट भर गए .” उन्हें इस भेदभाव और त्याग से क्या संतुष्टि मिलती थी मैं समझ नहीं पाती थी .माँ अपने भोजन ,कपडे ,शौक ,घूमने फिरने सभी चीज़ों में भेदभाव करती थीं .पापा से हमेशा कम बहुत कम ही खर्च स्वयं पर करती थीं . रूखी सूखी खा कर भी माँ अब तक स्वस्थ बनी हुई हैं जबकि पापा ह्रदय रोग , मधुमेह रोग से परेशान हो गए थे. वे योग भी करते थे व्यायाम भी करते थे .उनका आहार विहार सब माँ की निगरानी और अनुशाषण में बँधा था.फिर भी इस संसार से उन्होंने माँ से पहले विदा ले लिया .उनके सदा के लिए चले जाने के बाद माँ मानसिक रूप से थोड़ी असंतुलित हो गई हैं .वे आज भी पापा का इंतज़ार करती हैं .कहती हैं ,” पापा के खाना दे दा …जब तक न ना खइहें हम कैसे खा सकित है ” यह मानसिक असंतुलन उनके असन्तुलित भोजन का परिणाम है या पापा के प्रति असीम प्यार का परिणाम .ठीक ठीक क्या समझूं ?? .पर आज मैं जब अपने पति के साथ ही बराबर के भोजन से दो थालियां सजाती हूँ तो माँ का स्वयं के प्रति किया भेदभाव बहुत सालता है .एक स्त्री का मानसिक शारीरिक स्वास्थय संतुलित भोजन पर निर्भर करता है…माँ यह क्यों नहीं विचार कर पाती थीं.शायद माँ और मुझ में इस सोच का अंतर परिवार के आकार और फलस्वरूप आर्थिक स्थिति का ही अंतर रहा .कितना फर्क है माँ के समय की स्त्रियों और हमारे समय की स्त्रियों के बीच .यह भेदभाव शिक्षा के अभाव से भी उपजा था .माँ अगर शिक्षित होती तो वे एक पुत्र के इंतज़ार में अनचाही पुत्रियों के मातृत्व की ज़हमत कभी ना उठाती .वे अपना निर्णय स्वयं लेती .पापा को भी छोटे परिवार के लिए समझा पाती .
माँ आज भी जीवित हैं ..बड़े भाई के पास रहती हैं.पापा को अक्सर याद करती रहती हैं … उन्होंने स्वयं के प्रति भेदभाव किया और ईश्वर ने उन्हें ही अकेला छोड़ दिया ... माँ को याद कर बहुत दुःख होता है .

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