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मुझे इतना संवेदनशील मत बनाओ

Posted On: 8 Jan, 2015 Others में

V2...Value and Visionextremely CRUDE ; completely PURE

yamunapathak

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ज़रुरत और सभ्यता के एक एक सोपान चढ़ता मानव समाज रोटी,कपड़ा,मकान,कला संस्कृति से कब धर्म तक आ गया उसे इल्म तक ना हुआ और सच भी है धर्म तो परिष्कार का विषय है और परिष्करण कब आरम्भ होता है इसका आभास स्वयं को ही नहीं हो पाता है. आदिम मानव जब किसी शक्ति को समझ नहीं पाता था तो उसकी पूजा अर्चना शुरू कर देता था .एक समय बिजली उसके लिए पूजनीय थी पर जब स्वयं ही उसका आविष्कार कर लिया तो यह समझ के दायरे में भी आ गई.धर्म एक परिष्करण है .दुःख की बात यह कि विज्ञान जितने तेजी से आगे बढ़ रहा है धर्म के व्यापक अर्थ से मानव उतना ही दूर होता जा रहा है.

अपनी सभ्यता संस्कृति को विस्तृत नए अनुशासित आयाम देने के लिए जिस धर्म की अवधारणा मानव समाज ने रखी आज अपनी नासमझी और विवेकशून्यता के परिणामस्वरूप उसी धर्म की गिरफ्त में वह छटपटा रहा है .भूखमरी,गरीबी,बेकारी,अशक्तता.अपंगता से भी ज्यादा संवेदनशील बना यह धर्म अपनी प्रतिरोधक क्षमता खो रहा है मौसम की हल्की सी मार भी उसे रूग्ण बना रही है. बीमार ,लाचार ,असहाय धर्म चीत्कार कर कह रहा है ,“मुझे इतना संवेदनशील मत बनाओ.”

Copy of Desktop22क्या असली धर्म इतना असहाय होता है ?कोई भी विवेकशील व्यक्ति कह उठेगा ,”नहीं,कभी नहीं.”बचपन में लाजवंती के पत्तियों को छूने से जब वे सिकुड़ जाती थीं तो यह खेल बहुत अच्छा लगता था .आज तक ना जान सकी कि लाजवंती या छुई मुई इतनी संवेदनशील क्यों होती है पर आज जब धर्म को इतना संवेदनशील बनते देख रही हूँ वह खेल बार बार याद आता है .दरअसल मानव समाज ने धर्म को ऐसा लट्टू बना दिया है जो मानव के हाथों का खिलौना बन अपनी ही धुरी में नाचने को विवश है ….पर कब तक अंत में वह लट्टू थक कर वहीं धराशायी हो जा रहा है.मानव समाज भूल जा रहा है कि धर्म तो एक सूर्य की तरह है.सात रंगों में बंटा(हिन्दू,मुस्लिम,सिख,ईसाई,पारसी,जैन,बौद्ध,आदि)हरा रंग लाल नहीं हो सकता ,लाल रंग हरा नहीं हो सकता पर संग्रहीभूत तो उसी एक सूर्य में होते हैं जो समस्त ऊर्जा का केंद्र है .सूर्य और उसकी धूप या उसकी किरणों में कुछ भी भेद नहीं है.मंदिर का यह कैसा प्रेम कि मस्जिद जल जाए और मस्जिद का कैसा प्रेम कि मंदिर टूट जाए .धर्म गलत हाथों में पड़ जाए तो औषधि को जहर कर दे और अगर सही विचारों में हो तो ज़हर औषध बन जाए.

Desktop14धर्मांतरण,घर वापसी,धर्माभिव्यक्ति महज़ शब्दों के खेल से ज्यादा कुछ भी नहीं है.मनुष्य तो कोरे कागज़ सा जन्म लेता है.उस पर शुरुआती इबारत परिवार लिखता है फिर समाज राज्य देश से रूबरू होता वह विश्व का हिस्सा बन जाता है.जिस परिवार समाज की सोच जितनी परिष्कृत वह मनुष्य उतना ही परिष्कृत होता है.उसमें रूपांतरण संभव है जैसे कोयला हीरा बन जाए पर वापस कोयला कभी ना बन पाये .मनुष्य में बदलाव की कोई गुंजाईश न हो बर्फ से ….जल और जल से ….वाष्प पुनः ….बर्फ का बदलाव उचित नहीं यह तो बाह्य परिस्थितियों से उपजा प्रभाव है जो अल्पकालीन है.यह रूपांतरण धर्म से कतई सम्बंधित नहीं .स्वीकार्य हो तो ह्रदय का रूपांतरण जो सही अर्थों में धर्मान्तरण है सही मायनों में घर वापसी है .जैसा डाकू अंगुलिमाल में वाल्मीकि बन कर हुआ .जैसा अशोक महान में कलिंग युद्ध की हिंसा के बाद हुआ यही है असली घर वापसी ….रूपांतरण.जिसमें स्वप्रेरणा का महत्व है किसी बाह्य प्रभाव का कतई नहीं.ईश्वर की मूर्ति चाहे जैन धर्म में हो या हिन्दू धर्म में शेर और भेड़ साथ साथ बैठे मिलते हैं यह बहुत प्रतीकात्मक है .धर्म का स्वभाव ही यही है कि ऐसा प्रभाव उत्पन्न कर दे कि भेड़ को कोई भय नहीं और शेर को भेड़ को खाने की भी कोई भूख नहीं हो .
भारतीय संविधान अपने अपने धर्म के प्रचार प्रसार की छूट देता है पर अपनी इच्छा से धर्म को मानने पूजा अर्चना करने का भी मौलिक अधिकार देता है जो व्यक्ति विशेष का निजी अधिकार है जिसमें स्वप्रेरणा ही एकमात्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है .ऐसे में घर वापसी या धर्मांतरण (शब्दों का अंतर्विरोधी महाजाल)दोनों ही अस्वीकार्य है.
साक्षी महाराज को भी चार पांच बच्चों के जन्म की बजाये ज़रूरतमंद बच्चों को गोद लेने या उनकी मदद करने का सन्देश देना चाहिए यही असली धर्म है.
कल ही पैगम्बर मोहम्मद के कार्टून बनाने  की बात को लेकर पेरिस में फ़्रांस की प्रसिद्द और धार्मिक कट्टरपंथ के साथ मान्यताओं पर चोट करने वाली विवादित साप्ताहिक पत्रिका शार्ली हेब्दो के कार्यालय पर जिस तरह से आतंकियों ने हमला किया और १२ लोगों को मार कई अन्य लोगों को घायल भी किया उससे पूरी दुनिया सकते में है.धर्म के संस्थापकों ने कभी भी यह ना सोचा होगा कि धर्म इतना संवेदनशील मुद्दा बन जाएगा .आज वैश्विक ग्राम की अवधारणा तकनीक विकास के विमान पर सवार तेजी से आगे बढ़ रही है,चेतना और जागरूकता ने सात समंदर पार के लोगों को भी वैचारिक संबंधों में बाँध दिया है ऐसे में अभिव्यक्ति के माध्यम लेखन,वक़्तव्य,कार्टून पेंटिंग्स ड्रामा गीत संगीत के लिए माइक्रोस्कोपिक नज़रिया क्या अभिव्यक्ति का दम घोंटने सा नहीं लगता ???पर ऐसा होता रहा है.उन्मादी शक्तिशाली व्यक्ति की गलत बात को अभिव्यक्त करने से अंजाम उस बालक सा होता है जिसने एक राजा को वस्त्रहीन हो घूमते देख कर उसके सामने ही उसे नँगा कह दिया था जबकि अन्य लोगों ने राजा के नग्नता को नयी शैली मान प्रसंशा की थी और कुछ चुप रहे थे .दरअसल धर्म के नाम पर ऐसी संकीर्णता ,इतनी संवेदनशीलता धर्म के बाह्य आवरण से जुड़ने का यह परिणाम है…प्रत्येक धर्म के अपने कुछ प्रतिमान हैं जो उस धर्म विशेष के लोगों के लिए पूजनीय होते हैं और वे उन प्रतिमानों में ज़रा सा भी हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं कर सकते …..कृष्णा बंसी बजाते दिखाए जा सकते हैं पर नग्न समाधिस्थ नहीं ;उसी प्रकार महावीर नग्न समाधिस्थ दिखाए जा सकते हैं पर होठों पर बंसी माथे पर मुकुट के साथ नहीं …..श्री राम सूली पर नहीं दिखाए जा सकते और जीसस धनुष तोड़ते हुए नहीं….पारसी सिर्फ अग्नि  की ही पूजा करते हैं….मृत शरीर को चील कौओं को खाने के लिए किसी कुएँ में लटका देते हैं जो हिन्दू धर्म के सर्वथा विरोधः है पर यही विशेष धर्मों की विशेष व्यवस्था है .पेरिस की आतंकी घटना धर्म और इंसानियत के नाम पर एक बेहद दर्दनाक हमला है.यह अवश्य विचारने की बात है कि ऐसे वक़्त न तो पत्रकारिता बंद हो सकती है ना अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर अभिव्यक्ति की परिपक्वता ,संवेदनशीलता और विवेकशीलता अवश्य ध्यान में रखी जा सकती है.यह अवश्य ध्यान में रखा जा सके कि अभिव्यक्ति की शैली ऐसी हो कि सन्देश लोगों के समझ में भी आये और कोई विवाद भी ना उत्पन्न करे विशेष कर तब जबकि वे धर्म के बाह्य आवरण से जुड़े मुद्दे हों .धर्म सृजन करता है विध्वंश नहीं .यह आतंक तो धर्म के नाम पर उन्माद है क्योंकि उन्माद की कोई सीमा नहीं होती कोई होश नहीं होता है.यह धर्म के असली अर्थ को नकारने वाला कृत्य है .धर्म से सम्बंधित मामलों में अभिव्यक्ति से आहत होने पर विरोध के दूसरे तरीके भी हैं जो शांतिप्रिय हो सकते हैं आतंकी हमले या जान ले लेना विरोध का यह तरीका पूर्णतः अमानवीय और अस्वीकार्य है.आतंक की इस घटना की जितनी निंदा हो वह कम ही है.आतंक को तो बस बहाना चाहिए .वह ना उम्र देखता है न धर्म …इस आतंकी हमले में पुलिसकर्मी अहमद मेरबेट मुस्लिम थे उन्होंने आतंकी से दया की अपील भी की थी पर आतंकी ने उन्हें गोली मारी .पेशावर में स्कूली बच्चों पर आतंक की घटना भी इस बात का सबूत है कि आतंकी ना धर्म देखते हैं ना उम्र बस खून की नदियों से ही उन्हें लगाव है .आतंक एक ऐसे सिरफिरे शेर का सा व्यवहार करता है जिसके सामने सभी मेमने हैं वह शक्ति का बेजा प्रदर्शन करता और उन्हें धमकाता है ,”तुमने मेरे तरफ आने वाला पानी गन्दा क्यों किया .” तुमने नहीं तो तुम्हारे पूर्वजों ने किया और मैं उसका बदला तुमसे लूँगा.”ऐसे शेर को ख़त्म करने के लिए सभी को अपनी शक्ति लगा कर एकजुट होना होगा ठीक उस वीडियो में दिखाए जंगली भैसों की एकजुटता की तरह जिन्होंने शेर को हवा में उठा उठा कर पटका और भीगी बिल्ली बनने को मज़बूर कर दिया यह वीडियो अभी अभी खूब वायरल हुआ है .

कोई भी धर्म कभी मरने मारने की बात नहीं करता …

इबादत है दुखियों की इमदाद करना
जो नाशाद हों उनका दिल शाद करना
खुदा की नमाज़ और इबादत यही है
जो बर्बाद हों उन्हें आबाद करना .

(ईश्वर मृत आत्माओं को  शान्ति दें )

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