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मेरी हवा में रहेंगी,याद की बिजलियाँ

Posted On: 14 Apr, 2012 Others में

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yamunapathak

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18080911यह ब्लॉग मैं ” इतिहास में आस” ब्लॉग की प्रतिक्रिया स्वरुप’ प्रतीक राज जी ‘(अप्रैल११) द्वारा पूछे एक शंका समाधान के कोशिश के रूप में लिख रही हूँ.उनका प्रश्न यह है “गांधीजी ने भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी से बचाने के लिए कुछ क्यों नहीं किया?आज भगत सिंह के बहुत से समर्थक हैं तो उस समय भी होंगे फिर तत्कालीन राजनेताओं ने उन्हें बचाने के लिए ठोस कदम क्यों नहीं उठाये?”

मेरी हवा में रहेंगी,याद की बिजलियाँ

मुश्ते ख़ाक है फानी,रहे रहे ना रहे.

ये अलफ़ाज़ हैं भगत सिंह के जिन्होंने ३ मार्च १९३१ को अपने अनुज कुलतार सिंह के नाम लिखे पत्र में शेर लिखकर अपना सन्देश दिया था.

जब भगत सिंह ने असम्बली में धमाका किया था तो कुछ लोगों ने उनके रास्ते को अहिंसक मान कर आलोचना की थी.पर उन्होंने यह रास्ता क्यों चुना? यह भी विचार करना ज़रूरी है.जिस समय वे जवान हो रहे थे, देश घोर निराशा के दौर से गुज़र रहा था.कांग्रेस दल बहस-मुहाबिसों का मंच थी.अंग्रेजों के ज़ुल्म बुलंदियों पर थे.जालिआंवाला बाग़ घटना और लाला लाजपत राय की लाठी चार्ज के बाद मृत्यु ने युवकों को हिला कर रख दिया था.ऐसे में गांधीजी का पदार्पण हुआ. वे दक्षिण अफ्रीका में किये गए अपने अहिंसक प्रयोगों को भारत में अपनाना चाहते थे.भगत सिंह भी जानते थे कि १८५७ में तो फौज ने हिस्सा लिया था फिर भी हम हार गए थे पर उनका यह भी तर्क था कि आज़ादी का एहसास कराने के लिए बहरी अंग्रेज सरकार को बम के धमाके की आवाज़ सुनाना ज़रूरी है.देश को भी जब तक चौंका कर जगाया नहीं जाएगा तब तक गांधीजी का भी प्रयोग कभी सफल ना हो सकेगा.

दोनों सर्वथा विपरीत हिंसक और अहिंसक विधियों की तुलना जितना कठिन आज है उतना ही उस समय भी था.यह सिद्धांतों की असहमति ने ही आज इस शंका को जन्म दिया है .यूँ भी अगर किन्ही दो व्यक्तियों में वैचारिक मतभेद भी हो जाए तो कुछ लोग इसे उनकी कट्टर दुश्मनी मान बैठते हैं जो सरासर गलत है.

23 मार्च से पहले ५ मार्च को गांधी-इरविन समझौता हुआ था.लोगों का मानना था कि गांधीजी इस समय फांसी की सज़ा माफ़ करने का प्रस्ताव रख सकते थे .दरअसल इस समझौते के मसौदे ब्रिटिश सरकार ने पहले ही तय रखे थे जिसमें इस बात के ज़िक्र का सवाल ही नहीं था.फिर भी, गांधीजी रात में वाइसराय से मिलने डॉक्टर मुख्तार अहमद अंसारी के घर चले जाते थे और इसी मुद्दे पर बहस करते थे.चर्चिल तो इस अंतहीन बहस से परेशान होकर इसी दौरान गांधीजी को नंगा फ़कीर कह बैठा.उसने कहा:-

“it is alarming and nauseating (disgusting) to see Mr. gandhee a seditios middle temple lawyer now posing as a FAKIR of a type well known in the East striding half naked up the steps of the viceroy palace–to parley (a meeting between opponents to discuss terms for truce)on equal terms with the representatives of the king emperor.”

गांधीजी ने स्वयं स्वीकार किया है कि फांसी की सज़ा माफ़ करने के लिए उन्होंने वाइसराय से बात की थी. पर उसके कदम ब्रिटिश राज़ के आदेश पर चलते थे और इंग्लॅण्ड में बैठे ब्रिटिशों ने भगत सिंह ,राजगुरु और सुखदेव को अपने लिए ललकार मान लिया है.गांधीजी के अनुसार:-

“I pleaded with the viceroy as best as i could.I brought all the persuation (तर्कसंगत दलील ) at my command to bear on him.on the day fixed for the final interview with Bhagat singh’s relations,I wrote a letter to viceroy on the morning of 23 march.i proved my soul into it.but to no avail.i might have done one thing.i might made the commutation a term of the settlement.”

वे नहीं जानते थे कि पत्र लिखने और पहुँचाने के बीच समय लग जाएगा.गांधीजी खुद ब्रिटिश राज के खिलाफ लड़ रहे थे.दोस्तों यह इस स्वतंत्र भारत का परिदृश्य नहीं था जहाँ अपने लोग ही अपनों की ह्त्या कर देते हैं और उनकी सज़ा माफ़ करने की कोशिश लगभग सफल हो जाती है.वह तो गुलाम भारत था जहाँ अपनों(भगत सिंह) के लिए अपनों(गांधीजी) की वकालत पराया(ब्रिटिश राज) सुनने के लिए किसी भी हाल में तैयार ना था.यही गुलाम भारत का असली दर्द था.अखिल भारतीय कांग्रेस इन तीनों की ज़िन्दगी बचाने के लिए बेकरार थी.पर अंग्रेजों की धूर्त चाल थी कि उन्होंने कराची अधिवेशन के ठीक एक रात पूर्व को फांसी की तारीख घोषित कर दी .वे इस प्रकार कांग्रेस को अधिवेशन में छटपटाते और बेबस देखना चाहते थे.जिस बात पर भारतीय एकमत होकर सहमत होते थे उन बातों को ब्रिटिश सबसे पहले दरकिनार करती थी,क्योंकि उन्हें एकजुट भारत से ही सर्वाधिक डर लगता था.

लॉर्ड इरविन ने गांधीजी के दलील को सुनकर कहा था:-

“As I listened to Mr.gandhee putting the case of commutation before me,I reflected first on what significance it surely was that the apostle (enthusiastic supporter) non violence should so earnestly to pleading the cause of the devotees of a creed so fudamentally opposed to his own but i should regard it as wholly wrong to allow my judgement to be influenced by purely political consideration.i could not imagine a case in which under the law penalty had been more directly deserved.”

वह गांधीजी से व्यक्तिगत रूप से १९ मार्च को मिला भी उसी दिन भगत सिंह और दोनों साथियों ने वाइसराय को एक पत्र भी भेजा था पर वह उनकी तरफ से भेजी कोई दया याचिका नहीं थी उसमें स्पष्ट तौर पर उनके द्वारा कहा गया कि वे स्वतन्त्रता सिपाही हैं उन्हें या तो शूट किया जाए या फांसी दी जाए.यह पत्र आज भी उपलब्ध है.भगत सिंह के मित्र प्रेमनाथ मेहता ने मार्च २० को दया याचिका पत्र का ड्राफ्ट भगत सिंह से हस्ताक्षर करने को कहा था पर भगत सिंह ने साफ़ मना कर दिया था वे अपनी सज़ा को माफ़ कराने के पक्ष में नहीं थे.

गांधी-इरविन समझौते के परिणामों से प्रत्येक नेता असंतुष्ट थे.उन सब ने बार-बार यही कहा” ऐसे समझौते का क्या अर्थ जो भगत और उनके साथियों के मानव अधिकार की रक्षा ना कर सके.”नेताजी एस.सी .बोस ने कांग्रेस के वामपंथियों से कहा,”Between us and the British lies an ocean of blood and mountain of corpses.nothing on earth can induce us to accept this compromise which gandhiji had signed.”

गांधी जी जहां भी गए युवकों ने लाल झंडे लेकर विरोध किया और प्रश्नों की बौछार कर दी.अखिल भारतीय कांग्रेस बैठक कराची में वे चिलाये,”Gandhiji’s truce (an agreement between enemy to stop fighting for a certain time) sent Bhagat Singh to the gallows.(execution by hanging)”

गांधीजी ने उस अधिवेशन में कहा,”अगर मुझे भगत सिंह और उनके साथियों से मिलने का अवसर मिलता तो मैं उन्हें समझाता कि हम हिंसा से स्वराज नहीं हासिल कर सकते यह तरीका हमें बर्बादी की तरफ ले जाएगा,क्योंकि हमारे आन्दोलन के साथ महिलाएं भी जुडी हैं क्या वे इसे हिंसक देख कर इस आन्दोलन में शामिल होंगी और बच्चे ‘वानर सेना’जिन्होंने इस आन्दोलन का हिस्सा बनने के लिए अपने खिलौने,पतंग आदि छोड़ स्वराज के सिपाही बनाने का साहस किया है उन्हें हम कैसे और क्यों हिंसक तरीकों के हवाले कर दें?”

इन सारी बातों से स्पष्ट है कि उस वक्त के सभी राजनीतिज्ञों ने फांसी की सज़ा रुकवाने का भरपूर प्रयास किया पर अफ़सोस हम गुलाम थे और ब्रिटिश राज के खिलाफ अपनी आज़ादी के लिए संघर्षरत थे , वहां गांधीजी की भी कोई दलील काम नहीं कर पाई.

पाठकों ,भगत सिंह का विश्वास था कि” भविष्य की रक्षा नौजवान ही कर सकते हैं क्योंकि उनमें जोश होता है पर होश पैदा करने की ज़रूरत होती है.होश पैदा करने के लिए उन्होंने जो रास्ता अपनाया था वह यह था कि मैं इतना पढूं कि अपने यकीन के हक में दलील दे सकूँ ,समाज में चल रही सब दलीलों को समझ कर दुश्मन की दलील का ज़वाब दे सकूँ”.इसलिए वे और उनके साथियों ने खूब पढ़ा पर उनकी पढ़ाई उन्हें सोचने-समझने के काबिल बनाने के लिए थी.

भगत सिंह ने १९२८ में कहा था कि” भारत की दुर्दशा के हिस्सेदार वे लोग हैं जिन्हें राम की तो चिंता है पर राम के लोगों की नहीं,खुदा की फ़िक्र है पर खुदा के बन्दों की नहीं,वाहे गुरु की परवाह है पर वाहे गुरु के इंसानों की नहीं.”

उनके भांजे प्रोफ़ेसर जगमोहन ने भगत सिंह के कहे शब्दों को इस तरह बताया था,”मैं अपनी अंतःप्रकृति पर विवेक की सहायता से विजय पाना चाहता हूँ …………प्रयत्न तथा प्रयास करना मनुष्य का कर्त्तव्य है,सफलता तो संयोग तथा वातावरण पर निर्भर है.”

भगत सिंह ने एक शेर लिखा था———

कमाले बुजदिली है अपनी ही आँखों में पस्त होना

गर ज़रा सी जुर्रत हो तो क्या कुछ हो नहीं सकता

उभरने ही नहीं देती यह बेमाइगियाँ दिल की

नहीं तो कौन सा कतरा है,जो दरिया हो नहीं सकता..

सूचनाओं के अंश नेट से साभार

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