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मेरे,हारे हुए सिपाहियों !(jagran junction forum )

Posted On: 3 Sep, 2012 Others में

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yamunapathak

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हर व्यक्ति में एक विद्यार्थी के साथ एक शिक्षक का भी अक्श अदृश्य रूप से जीवन पर्यंत विद्यमान रहता है अर्थात हर मनुष्य आजीवन सीखता और सिखाता है.इसी अटूट विचारधारा के साथ शिक्षक दिवस के शुभ अवसर पर प्रत्येक नागरिक को यमुना का हार्दिक अभिनन्दन.
शीर्षक पढ़ कर आप एक बारगी चौंक गए होंगे कि शिक्षक दिवस पर लिखे ब्लॉग में सिपाही शब्द का क्या औचित्य ?दरअसल यही वे चार शब्द हैं जिन्होंने मुझे एक शिक्षिका के रूप में प्रतिष्ठित होने में अमूल्य योगदान दिया. गुरु-शिष्य परम्परा के वर्त्तमान परिदृश्य से बहुधा लोग असंतुष्ट नज़र आते हैं .मैं उन के इस असंतोष से कुछ अंश तक सहमत भी हूँ पर यह भी मानती हूँ कि कुछ शिक्षकों के गलत आदर्श की वज़ह से इस दिवस की प्रासंगिकता समाप्त नहीं हो सकती.इतिहास में द्रोणाचार्य जैसे गुरु के गलत मकसद के कारण एकलव्य जैसे शिष्य के साथ हुई नाइंसाफी से सभी वाकिफ हैं पर इससे वशिष्ठ,संदीपन,विश्वामित्र जैसे गुरुओं की प्रतिष्ठा में आंच नहीं आयी.अगर हम एक शिक्षक के रूप में इस पद की गरिमा को प्रतिस्थापित ना कर सकें तो इसमें कुछ आदर्श विहीन शिक्षकों से ज्यादा दोष अच्छे शिक्षकों का है .बुरे शिक्षक अनाज में मिले कंकड़ की तरह हैं; संख्या में अल्प और आसानी से पहचान कर फेंक दिए जाने योग्य ,जिन्हें समाज का कोई भी तबका महिमामंडित नहीं करता है.समाज आज भी शिक्षक की चरित्र हीनता को सर्वाधिक हिकारत से देखता है .समाज की यह प्रवृति ही इस बात का प्रमाण है कि इस पद की गरिमा समाज में आज भी सबसे ऊँची है.
मैं खुशनसीब हूँ कि बचपन से ही मेरे व्यक्तित्व निर्माण में लगभग प्रत्येक शिक्षक-शिक्षिकाओं का भरपूर योगदान रहा पर यहाँ मैं उन शिक्षकों का ज़िक्र करना पसंद करूंगी जिन्होंने मुझे इस व्यवसाय में सर्वोत्तम देने के लिए प्रेरित किया.
बात उन दिनों की है जब सिविल सेवा की परीक्षाओं में लागातार दो बार मैं असफल हो चुकी थी और बड़े भाई साहब ने सलाह दी कि मैं बी.एड कर लूँ.मैंने बेमन से उनकी बात मानी और प्रवेश परीक्षा में बैठी.परिणाम निकलने पर अखबार में मेरा नाम अव्वल पर था. यह देख कर मुझे प्रेरणा मिली और मैं ने अच्छे कॉलेज में प्रवेश ले लिया.प्रथम दिन introductory क्लास में HOD ने हम सभी को संबोधित किया,मेरे, हारे हुए सिपाहियों !मैं जानता हूँ कि आप में से प्रत्येक विद्यार्थी इस व्यवसाय से सम्बंधित कॉलेज में by choice नहीं by chance या यूँ कहूँ कि by compulsion या नो option की वज़ह से आया है.“यह बेहद कटु सत्य था पर फिर भी हिम्मत जुटा कर मैने कहा,”माफ़ करिए सर, आपका यह संबोधन अशोभनीय है”उन्होंने कहा,”ठीक है,पर सच कहो क्या तुम इस व्यवसाय से by choice जुड़ना चाहती हो?”मैं निरुत्तर थी पर अंतर्मन ने ज़वाब दिया,”आप की बात सही है पर अब मैं इस कॉलेज से टॉप अंकों से सफल होकर एक सर्वोत्तम शिक्षिका बन कर दिखाउंगी.”उस कॉलेज में मुझे कई प्रबुद्ध शिक्षक मिले जिनके मार्गदर्शन से मैंने बी.एड. में टॉप किया और उनकी शिक्षा को आज भी संवाहित करने का भरसक प्रयास करती हूँ.

यह सच है कि शिक्षण व्यवसाय को बहुत कम लोग ही स्वेच्छा से अपनाते हैं जिसका मुख्य कारण इस व्यवसाय में आकर्षक वेतन का अभाव है.मानव चरित्र का निर्माण करने वाले इस गरिमामयी पद पर समाज सारे आदर्श  थोप देता है पर उन आदर्शों पर आकर्षक वेतन की कगार कभी नहीं बनाता. जिसका परिणाम शिक्षकों के द्वारा निजी tution ,अवसाद,झुंझलाहट इत्यादि के रूप में सामने आता है.अभाव ग्रस्त कुछ शिक्षकों का स्वभाव वितीय साधन के अभाव में बदलने लगता है.
शिक्षा के क्षेत्र में होने वाली नित्य नवीन प्रयोगों ने भी मूल उद्देश्य से भटकाव की स्थिति उत्पन्न कर दी है.शिक्षा के नए-नए प्रतिमानों को प्रतिष्ठित करने में workshop ,सेमीनार,orientation कार्यक्रम नयी bottle में पुरानी शराब से ही साबित होते हैं.ऐसी ही एक orientation कार्यक्रम में एक अजीबोगरीब बात से रु-ब-रु हुई.कार्यक्रम देनेवाले महोदय ने एक प्रश्न (अगर विद्यार्थी बड़े और बेतरतीब केश रखे तो उसे कैसे समझाया जाए) के ज़वाब में कहा,”आप उसके केश पर ध्यान ही क्यों देते हो? आपका काम उसे अध्याय पढ़ाना है वह उस अध्याय को समझ रहा है या नहीं इस पर ध्यान केन्द्रित होना चाहिए.”मुझे उनके इस कथन पर आश्चर्य हुआ और उनसे इजाज़त ले कर मैंने पूछा,”सर आप इस कार्यक्रम में सूट -बुट में क्यों आये हैं साधारण सी पोशाक में क्यों नहीं आये ?”उन्होंने कहा,”जैसा स्थान हो वेश भूषा भी उसके अनुकूल होनी चाहिए यही सभ्य होने का प्रमाण है.”मुझे तो बस ऐसे ही ज़वाब की अपेक्षा थी .उनकी इच्छा पर मैंने कार्यक्रम के अगले क्रम में एक वक्ता की भूमिका के तौर पर शिरकत किया और उस दिन जो भी बात रखी वह इस प्रकार थी.———–

विद्यार्थी का विद्यालय आने का मुख्य मकसद सिर्फ विषय की समझ नहीं बल्कि समाज में अपेक्षित आचार-विचार, व्यवहार आदि की शिक्षा ग्रहण करना भी होता है.किसी विद्यार्थी के बेतरतीब से बिखरे बड़े बालों पर एक शिक्षक का ध्यान इस लिए जाता है क्यों कि वह उसे सिर्फ 3R ‘s (reading ,writing ,arithmetic )की ही शिक्षा देना नहीं चाहता अपितु उसे 7R ‘s (reading ,writing ,arithmetic ,responsibility ,right ,respect और relation )से भी वाकिफ करना चाहता है.शिक्षक शब्द स्वयं में ही एक गूढ़ अर्थ लिए होता है यह एक मार्गदर्शक सृजनकर्ता का पर्याय है.वह एक ज्योति पुंज है जो विद्यार्थी के जीवन में सात वर्णों में खंडित हो जाती है.वे सात रंग जिससे उस विद्यार्थी के व्यवहार परिमार्जित और परिष्कृत होते हैं और वे सात रंग हैं………….

KASUVBPR

1–K ———KNOWLEDGE
2–A ———ATTITUDE
3–S———SKILL
4–U——–UNDERSTANDING
5–V——–VALUE
6–BP——BEHAVIOUR PATTERN
7–R——-RESPONSIBILITY

इन सात रंग के वर्तुलाकार चाक को अगर हम तेजी से घुमाएं तो सिर्फ एक शुभ्र वर्ण प्रकट होगा श्वेत, सफ़ेद रंग और वही है संपूर्ण व्यक्तित्व जिसमें एक शिक्षक अपने विद्यार्थी को देखना चाहता है.एक शिक्षिका के रूप में मैंने कभी भी यह नहीं चाहा कि मेरे विद्यार्थी गांधी,नेहरु या विवेकानंद ही बने क्योंकि मैं जानती हूँ कि इन महापुरुषों के गुरुओं ने भी उनसे किसी महापुरुष की तरह बनने की आकांक्षा कभी नहीं रखी होगी .अगर उन्होंने ऐसा चाहा होता तो फिर भगत सिंह,सुभाष या कल्पना चावला जैसे महान शख्शियतों से हम कभी परिचित ही नहीं हो पाते. सभी पुष्प गुलाब नहीं होते पर हर पुष्प में अपनी निजता के साथ खुशबू और सुन्दरता प्रदान करने की पुरी क्षमता और संभावना होती है फिर चाहे वह जैसमीन हो चमेली या रात रानी.इसी प्रकार हर बच्चा स्वयं में अनोखी(unique ) प्रतिभा लिए होता है.उसमें अपने इस अनोखेपन के संग संपूर्ण रूप से विकसित होने की अपार संभावनाएं छुपी होती हैं; बस ज़रूरत है उसके व्यक्तित्व को पहचान कर उसके आधार को मजबूत करने की ताकि प्रत्येक देश,काल में इस धरा को हर बार एक अनोखी प्रतिभा का वरदान मिल सके और इस शुभ कार्य का सम्पादन एक शिक्षक के हाथों ही संभव है.

एक छोटी सी कहानी याद आती है.एक शिक्षिका ने अपनी नयी नियुक्ति के दौरान एक बालक मुन्ना को हमेशा गुमसुम देखा ,वह ना पढ़ाई में ध्यान देता ना ही खेल कूद में हिस्सा लेता था .नाराज़ हुए बगैर उसने मुन्ना के पुराने रेकॉर्ड्स देखने शुरू किये.प्रथम वर्ष के रिकॉर्ड में उसने लिखा पाया-“मुन्ना एक होनहार विद्यार्थी है पढ़ाई में अव्वल,व्यवहार में लाज़वाब पुरे विद्यालय की जान है.”.दूसरे वर्ष में लिखा देखा-“मुन्ना बहुत शैतानी करता है और किसी की बात नहीं मानता”.तीसरे वर्ष के रिकॉर्ड में लिखा था-“मुन्ना अत्यंत ही अनुशासनहीन हो गया है”.और चौथे वर्ष के रिकॉर्ड में लिखे शब्दों को पढ़ते ही पिछले रेकॉर्ड्स में लिखे शब्दों की वज़ह स्पष्ट हो गयी .उस वर्ष के रिकॉर्ड में लिखा था”माँ की लम्बी बीमारी से मृत्यु होने की वज़ह से मुन्ना अब बहुत ही शांत और गुमसुम रहने लगा है.अगर इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो यह गहरे सदमे में जा सकता है. “

शिक्षिका ने अब मुन्ना पर विशेष ध्यान देना शुरू किया और उनकी आत्मीयता से वह विद्यार्थी पुनः पूर्ववत होने लगा; मन लगा कर पढ़ाई करता,खेल कूद,वाद-विवाद संगीत सभी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेता. एक बार शिक्षक दिवस के अवसर पर मुन्ना मनकों की एक टूटी माला और perfume की आधी भरी शीशी के साथ शिक्षिका के पास आया और उनसे प्यार से कहा,”मैम ,इसे रख लो मेरी माँ के हैं”.शिक्षिका ने प्यार से दी गयी उस छोटी पर बेहद अनमोल भेंट को स्वीकार किया.कुछ महीनों उपरांत मुन्ना के पिता का स्थानान्तरण हो गया.वर्ष पंख लगा कर उड़ने लगे.और कई वर्षों बाद एक दिन शिक्षिका को किसी डॉक्टर के विवाह समारोह में शामिल होने का निमंत्रण कार्ड मिला.जब उन्होंने उसे खोल कर देखा तो उसमें एक पत्र भी था जिसकी इबारतें कुछ इस तरह थीं “आपकी उपस्थिति अनिवार्य है-मुन्ना” .मुन्ना को भला कैसे भुला जा सकता था .शिक्षिका ने मनकों की वही माला पहनी वही परफ्यूम लगाया और डॉक्टर मुन्ना के विवाह समारोह में शामिल हुई.मुन्ना अपनी teacher के गले लग कर बोला ‘”आपने मुझे इस मुकाम तक पहुंचाया आपका शुक्रिया.”उन्होंने भावुक होकर कहा,”मैंने तुम्हे बहुत कम सिखाया,असल में तुमने मुझे सिखाया कि एक शिक्षिका के रूप में मैं समाज को कई अनमोल भेंट दे सकती हूँ.”

यह है गुरु शिष्य के शाश्वत सम्बन्ध की वह परम्परा जो निर्बाध रूप से सदैव प्रवाहित होती रहती है.

वह कौन शिल्पकार है जिसने प्रस्तर को नव जीवन दिया
भाव-भंगिमा आकार के साथ, सुन्दर सा एक मन दिया
राह के पत्थर को सुन्दर बुत बना, कौन उपास्य कर गया ?
किस शिल्पकार का शिल्प आज, जग में रहस्य बन गया ?

विद्यार्थी कहो किस देश काल में रहा अपने शिक्षक से पृथक है?
रिश्तों का यह निर्वाह है शाश्वत, नहीं किसी भी काल में मिथक है.

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