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मोदी जी आध्यात्म और राजनीति

Posted On: 16 May, 2018 Politics में

V2...Value and Visionextremely CRUDE ; completely PURE

yamunapathak

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एक फूल का खिलना इस बात का संकेत है कि वसंत आने वाला है ।वसंत आ गया है बहुत सारे फूल एक साथ खिलकर इस बात पर मुहर लगा देते हैं ।एक चिड़िया की चहक से भोर का आभास होता है और फिर बहुत सारी चिड़िया एक साथ चहकी उठती हैं । आदरणीय प्रधानमंत्री मोदी जी का भारतीय राजनीति के विशाल धरा पर मजबूत कदम रखते हुए नभ की ऊंचाईयों तक देश को ले जाना और ‘ सबका साथ सबका विकास ‘ के समावेशी भाव से नेतृत्व करना एक चिड़िया की चहक और एक फूल के खिलने से भोर और वसंत की शुरूआत सी है ।वे एक आध्यात्मिक पुरुष हैंं ।उनका मंदिरों मेें जाना उनके धार्मिक होने का संकेत हो सकता है पर फिर भी वे किसी एक धर्म के संकीर्णता के पोषक कतई नहीें हैंं ।
यह कहा जाता है कि आध्यात्मिक लोगों को राजनीति मेें नहीें आना चाहिए । पर मेरा मानना है कि आध्यात्मिकता राजनीति की पहली शर्त हो जानी चाहिए, देश समाज तभी विकास की दिशा तय कर सकता है ।

 

 

आध्यात्मिक व्यक्ति निडर होकर राजनीति करता है क्योंकि वह जीवन को समग्रता मेें देखता है ।तभी तो मोदी जी का सबका साथ सबका विकास का नारा इंडिया शाइनिंग पर भारी पड़ता है । मोदी जी देश विदेश के हर कोने में जाते हैं ।सभी धर्म सम्प्रदाय तबके के साथ घुल मिल जाते हैंं ढोल बजाते है वक्तव्य से मन मोह लेते है ।अपने भाषण मेें विरोधी पक्ष की भरपूर आलोचना करते हैंं अपने लिए की गई आलोचनाओं का सामना करते हुए संदेश देते हैं , अच्छे कपड़े पहनते है उन्हे किसी भी चीज से गुरेज नहीें है । जब हम जानते है कि हमारे साथ लड़ने वाले गलत है तो हम सिर्फ और सिर्फ अच्छे साधनों से ही नहीें लड़ सकते। राजनीति मेें साम दाम दण्ड भेद जायज है ।साधारण अच्छा व्यक्ति बुराईयों से कभी जीत नहीं सकता।

 

अगर मोदी जी सहनशील हो जाएं तो विपक्ष के गलत तरीकों को और बढ़ावा मिल सकता है ।उनके भाषण सुनकर यह निष्कर्ष निकालना कि उनमें सहनशीलता का अभाव है ऐसा उचित नहीें ।वे सहनशीलता की सीमा और उसके प्रयोग से अच्छी तरह परिचित हैं ।महाभारत के युद्ध मेें श्रीकृष्ण ने भी यही किया था । मोदी जी अगर रैलियां न करें वक्तव्य न दे तो हो सकता है उनकी पार्टी को वह गति न मिले जिसकी वह आकांक्षा रखते है । और यह अथक पुरूषार्थ आलोचना का विषय होना ही नहीं चाहिए ।कोई भी नेता अपनी पार्टी के लिए यह कर सकता है ।वक्त के साथ कदमताल मिला कर चलना उनकी अपनी पहचान है। जब सामाजिक संरचनाएं बदलती है की बातें अप्रासंगिक हो जाती है ।
‘मेरे दादा ने घी खाया था मेरी हथेली सूंघ कर देख लो ‘
मेरे घर में हाथी था मैं सीकड़ लिए फिरता हूॅ ।

 

अतीत से पूर्ण रूप से चिपक कर सही वर्तमान और भविष्य की कामना नहीं कर सकते ।कांग्रेस ने यही गलती की है ।आध्यात्मिक व्यक्ति अपने किरदार को खूबसूरती से निभाने के लिए तन्मयता से काम करता है जैसे सूर्य का उगना फूल का खिलना ।
कर्नाटक के चुनाव और परिणाम मोदी जी के विजन और कार्य शैली पर जनता के विश्वास की बानगी है ।भाजपा की सरकार बनाने के लिए अपनी पार्टी के कुशल नेता के रूप में उन्हें जो उचित लगे वह अवश्य ही करना चाहिए ।कर्नाटक के कुरूक्षेत्र के लिए उन्हे कृष्ण की भूमिका निभाने की आध्यात्मिकता का पालन करना चाहिए ।

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