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'सन्देश' एक घायल सैनिक का -परिवार के लिए

Posted On: 26 Jul, 2013 Others में

V2...Value and Visionextremely CRUDE ; completely PURE

yamunapathak

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आज कारगिल दिवस पर उन सारे जांबाज़ शहीदों की शहादत को हम सब का शत-शत नमन जिन्होंने प्रत्येक अवसर पर हमारी रक्षा की हम सुख की नींद सोते रहे और वे हमारी हिफाज़त करते रहे .सैनिक देश की रक्षा के लिए अपने परिवार के सदस्यों के प्रति कर्त्तव्य नहीं पूरा कर पाने की कशमकश और पीड़ा से भी गुजरते हैं पर इस दर्द का एहसास हम आम जनता नहीं कर पाते इस ब्लॉग को लिखने का मकसद उस एहसास को जुबां देना है.

उत्तर प्रदेश प्रांत में एक लोक गीत शहीद की जुबां में कुछ इस तरह से गाया जाता है ……..

हमरी मरनी खबर जिन कहेया मित्र घर जाई…
छुपाई लीहा सारा भेदवा …..
तू जब जईबा हमरे द्वारे तोहसे मिलिहें पिता हमारे
ओनकर जलता दीपक फ़ौरन दिहा बुझाई…
छुपाई लीहा सारा भेदवा
जब तू जईबा हमारे द्वारे तोहसें मिलिहें मात हमारी
ओनके नैनं में आंसू फ़ौरन दिहा तू लाई …
छुपाई लीहा…सारा भेदवा
जब तू जईबा हमारे द्वारे तोहँसे मिलिहें भाई हमारे
ओनकी दाहिनी बाजू फ़ौरन दिहा झुकाई…
छुपाई लीहा…..सारा भेदवा
जब तू जईबा हमारे द्वारे तोहँसे मिलिहें पत्नी हमारी
ओनके मांग के सिन्दूर फ़ौरन दिहा मिटाई…
.छुपाई लीहा…सारा भेदवा
एक पाती घायल सैनिक की …

माँ से …
माँ तुम्हारा लाडला रण में अभी-अभी घायल हुआ है
पर देख उसकी शूरता खुद शत्रु भी कायल हुआ है
रक्त की होली रचाकर मैं प्रलयकर दिख रहा हूँ
माँ उसी शोणित से तुम्हे पत्र अंतिम लिख रहा हूँ
युद्ध भीषण था मगर ना एक इंच भी पीछे हटा हूँ
माँ तुम्हारी थी शपथ मैं आज इंचों में कटा हूँ
एक गोली वक्ष पर कुछ देर पहले ही लगी है
माँ कसम दी थी जो तुमने आज मैंने पूरी की है
छा रहा है सामने अब मेरी आँखों के अँधेरा
पर उसी में दिख रहा है मुझे वह नूतन सवेरा
कह रहे हैं शत्रु भी मैं जिस तरह से सैदा हुआ
लग रहा है सिंहनी के कोख से था मैं पैदा हुआ
यह ना सोचो माँ की मैं चिर नींद लेने जा रहा हूँ
मैं तुम्हारी कोख से फिर जन्म लेने आ रहा हूँ
पिता से …………
मैं तुम्हे बचपन में पहले ही दुःख बहुत दे चुका हूँ
और कंधों पर तेरे खडा हो आसमां सर ले चुका हूँ
तुम सदा कहते थे ये ऋण तुम्हे भरना पडेगा
एक दिन कंधों पे अपने ले मुझे चलना पडेगा
पर पिता मैं भार अपना तनिक हल्का ना कर सका
तुम मुझे करना क्षमा मैं पितरी ऋण ना भर सका
हूँ बहुत मजबूर यह ऋण ले मुझे मरना पडेगा
अंत में भी आपके काँधे ही मुझे चढ़ना पडेगा
भाई से…..
सुन अनुज रणवीर! गोली बांह में जब आ समाई
ओ मेरी बाईं भुजा !उस वक्त तेरी बहुत याद आई
मैं तुम्हे बाहों से अब सारा आकाश दे सकता नहीं
लौट कर घर आ सकूंगा यह विश्वास दे सकता नहीं
पर अनुज विश्वास रखना मैं थक कर नहीं पडूंगा
भरोसा रखना वतन खातिर सांस अंतिम तक लडूंगा
अब तुम्ही को सब सौंपता हूँ बहन का ध्यान रखना
जब पड़े उसको ज़रुरत वक्त पर उसका सम्मान करना
तुम उससे कहना कि रक्षा पर्व में यह भाई भी आयेगा
देख सकोगी तो अम्बर में नज़र आशीष देता आयेगा
पत्नी से…..
अंत में प्रिय मैं आज भी तुमसे कुछ चाहता हूँ
है कठिन देना मगर हो निष्ठुर मैं ये माँगता हूँ
तुम अमर सौभाग्य की बिंदिया सदा माथे सजाना
हाथ में चूड़ी की खनक संग पाँव में महावर रचाना
तुम नहीं कोई वैधव्य प्रतिमूर्ति ना ही कोई साधिका हो
अपितु अमर बलिदान की पुस्तक की पावन भूमिका हो
बर्फ की ये ऊंची चोटियाँ यूँ तो बहुत शीतल लगी थीं
तेरे प्यार की उष्णता से वे हिम शिला गलने लगी थीं
तुम अकेली नहीं धैर्य अपना एक पल भी ना खोने देना
भर उठे दुःख से ह्रदय पर आँख नम ना होने देना
शास्रानुसार सप्त पद की यात्रा से तुम मेरी अर्धांगिनी हो
सात जन्मों तक बजे जो तुम वह अमर रागिनी हो
इसलिए अधिकार तुमसे आज बिन बताये ले रहा हूँ
मांग का रक्तिम सिन्दूर तेरा मैं मातृभूमि को दे रहा हूँ .
(दोस्तों यह कविता मेरे एक मित्र के द्वारा लिखी गई थी )

जय हिन्द

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