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The best management guru

Posted On: 3 May, 2012 Others में

V2...Value and Visionextremely CRUDE ; completely PURE

yamunapathak

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वर्त्तमान युग में लगभग हर कार्य संस्थानों में कुछ बातें सर्वमान्य रूप से प्रशिक्षण तथा चर्चा का विषय हो गयी हैं-:

जैसे work-life balance, health & fitness, soft skill,time management,stress management, communication skill आदि इसके लिए बड़े विख्यात मैनेजमेंट गुरु के सेमीनार किये जाते हैं . इससे सम्बंधित विख्यात पुस्तकें पढी जाती हैं पर अगर हम आप अपने संपूर्ण जीवन पर नज़र डालें तो एक बात स्पष्ट है कि सर्वोत्तम management गुरु माँ ही होती है .

हर मैनेजमेंट गुरु कहते हैं “समय का प्रबंधन करो”अब ये तो माँ हमें बचपन से सीखाती हैं”बेटा,जल्दी उठो,समय से तैयार होकर स्कूल जाओ,गृह कार्य वक्त पर पूरा करो.”और पढने ,सोने,भोजन करने के निश्चित वक्त तय कर देती थी।

योजनापूर्ण कार्य के लिए बड़े -बड़े गुरु कहते हैं “कार्यालय में अपनी मेज़ साफ़ रखो ,files व्यवस्थित रखो मीटिंग के पहले papers,presentations, पॉवर पॉइंट फाइल आदि चेक कर लो ,” यही बात तो माँ कहती थी “अपने बिस्तर, पढने की मेज़ ,किताबों की शेल्फ सुव्यवस्थित रखो ,ऐसे में समय बर्बाद किये बगैर ज़रूरत के सारे सामान तुम्हे खोजने नहीं पड़ेंगे,किताब देख लो,पेंसिल शार्प कर लो,बैग में सारे सामान लंच बॉक्स,प्रवेश पत्र रखे हैं या नहीं ; जांच कर लो ताकि तुम्हे किसी परेशानी का सामना ना करना पड़े “

काम के साथ परिवार को भी समय देना है work life balance ताकि काम और ज़िन्दगी में संतुलन रहे ,माँ भी कहती थी पढ़ाई कर लो फिर किसी मित्र के घर घुमा दूंगी या सिनेमा ,मेला दिखा दूंगी ताकि पढ़ते-पढ़ते बोर ना हो जाओ “

सोफ्ट स्किल की शिक्षा तो आज सबसे अनिवार्य माना जाता है जो बचपन से हम माँ से सीखते आये हैं नम्रता,शिष्टाचार ,धैर्य ,सामाजिक रिश्तों का महत्व इत्यादि.

तनाव प्रबंधन जो आज हर कार्य क्षेत्र की अहम् ज़रूरत है वह माँ की शिक्षा से हम पहले ही सीख चुके होते हैं ;किसी को पलट कर ज़वाब ना देना ,क्रोध को वश में करना, अनावश्यक बहस में शामिल ना होना ,समय को देखते हुए कार्यों की वरीयता तय करना,सही  वक्त ,सही स्थान पर सही काम  करना आदि।

स्वास्थ्य के लिए जिम जाना लोग आवश्यक मानते हैं जबकि माँ हमें बचपन में बाहर खेलने पर पूरा जोर देती थी सही वक्त पर संतुलित आहार खिलाती थी ताकि हम स्वस्थ रहे.

जब ये सारी बातें माँ हमें बचपन में सीखाती आती है तो फिर से इनकी ज़रूरत संस्थानों में प्रशिक्षण के रूप में क्यों पड़ती है ?वह इसलिए कि हम जैसे-जैसे बड़े होते हैं अपने आप को समय से ज्यादा आगे और माँ को कई वर्ष पिछड़ा मान लेते हैं उनकी शिक्षा को भूलकर अपने नए -नए आयाम बना लेते हैं ..नई बात सीखने में कोई बुराई नहीं पर मुलभुत बातें भूलकर नहीं .

अब एक और बात;
हर वर्ष की तरह ये बहस हो सकती है कि माँ-पिता जो हर वक्त अपने बच्चों को प्यार से सींचते हैं उनके लिए सिर्फ एक दिन mother’s day या father’s day क्यों ज़रूरी है ?दोस्तों,यह ठीक उसी तरह है जैसे हर रिश्ते को एक विशेष दिन से जोड़ा गया है ;रक्षाबंधन से भाई -बहन को,valentines day से प्रेमी युगल को ,बाल दिवस से बच्चों को और यहाँ तक कि ईश्वर को भी हम अपनी धारणा और विश्वास के अनुसार श्रीराम को रामनवमी से ,श्री कृष्ण को जन्माष्टमी से,ईशा मसीह को 25 दिसंबर से,गुरु नानक जी को कार्तिक पूर्णिमा से ,हज़रत मुहम्मद जी को उनके जन्म दिवस से जोड़ते हैं .गणतंत्र दिवस ,स्वतन्त्रता दिवस को देश की संस्कृति और स्वतन्त्रता से जोड़ लेते हैं जब सार्वभौमिक रूप से “UNDER HEAVEN;ONE FEELING;ONE CELEBRATION” की भावना प्रबल हो जाती है तो फिर माता और पिता के लिए भी क्यों ना एक विशेष दिन लोगों को मनाने दें; जब सुदूर देश -परदेश में भी बैठा हर बच्चा सरहद की दीवार तोड़कर माँ के आँचल का साया महसूस करने के लिए बेकल हो जाए?

अपने बच्चों को दूर भेजना बहुत कष्टकर होता है आज से 20-30 वर्ष पूर्व लडकियां विवाह होने पर ही माता-पिता की दहलीज़ छोडती थी पर आज तो शिक्षा के सिलसिले में कम उम्र में ही उन्हें दूर जाना होता है पर वह क्षण भी माँ सहती है सिर्फ यह सोचकर कि जो बीज अपने मूल वृक्ष से जितना दूर छिटक जाएगा उसके पल्लवित -पुष्पित होने की संभावना उतनी ही ज्यादा होगी .हर वक्त वृक्ष के साए के नीचे तो बीज कभी भी सम्पूर्णता से विकसित नहीं हो पायेगा।

माँ-बेटी की जुदाई की कशमकश पर एक कविता

अपने आँचल के कोनों से,भीगी पलकें पोछी होगी
आज फिर से माँ सबसे, छुप-छुप कर रोई होगी
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बेटी संग व्यतीत लम्हों के,लिहाफ में लिपटी होगी
यादों के कई फूलों को,फिर दामन में समेटी होगी
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प्यारा रिश्ता माँ-बेटी का ,भूल तो ना कोई हुई होगी
फिर भी दोनों ने निज पलकें,अशकों से भिगोई होगी
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किया होगा खुद को वश में,जब दूर तलक गयी होगी
पर माँ के सन्मुख तो वह,बस झूठी ही मुस्कायी होगी
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आँखों में कितने अनदेखे सपने,बरसों से संजोई होगी
हकीकत में तब्दील होने की ,आस बेटी से लगाई होगी
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सफलता की कितनी कहानी ,माँ ने उसे सुनायी होगी
दूर रह कर पढ़ने की भी खूब, हिम्मत तो दिलाई होगी
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ओह!बिछड़ने की पीड़ा को,जाने कैसे बेटी ने छुपाई होगी
जाना तो था उसे दूर माँ से,पर जिस दिन वो पराई होगी
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रोकर मैं कमजोर ना होऊँगी, कसम उसने तो खाई होगी
भीगे नयन,शुष्क अधरों संग, माँ मंद-मंद मुस्काई होगी
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