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एक लघुकथा “स्वार्थ”

Posted On: 24 Mar, 2017 Others में

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yatindrapandey

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स्वार्थ

शाम ढ़लती जा रही थी, अँधेरा बढ़ रहा था, मालती के पैर डर से कॉप रहे थे, वो बारबार मोबाइल से एक ही नम्बर लगा रही थी, पर उत्तर पा कर और विचलित हो रही थी| एक बार दरवाजे पर, तो एक बार मोबाइल पर, और टीवी पर टकटकी लगाकर देख रही थी| तभी दरवाजें की घंटी बजी, सामने मालती का पति था, मालती ने ईश्वर का धन्यवाद दिया,और कहा भगवान् का लाखलाख शुक्र है, की आप ठीक है इस बम ब्लास्ट मे एक हजार से ज्यादा लोग मर गए है|

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