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अगर भ्रष्टाचार खत्म हो गया तो ?

Posted On: 7 May, 2012 Others में

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yogi sarswat

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मान के चलिए कि अन्ना हजारे जी के आन्दोलन ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया और लोगों के दिमाग बदलने लग गए | लोगों ने रिश्वत लेना और देना बंद कर दिया और कमीशन से तौबा कर ली ……….| नेताओं और अधिकारियों के मन ने उनको धिक्कारना शुरू कर दिया | घर में रिश्वत के पैसे लाने पर बीवी और बच्चों ने धिक्कारना शुरू कर दिया | मतलब ये कि भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों की आत्मा ने उन्हें कचोटना शुरू कर दिया , उनका जमीर जाग गया तो ……………? सोचिये कितना बड़ा नुक्सान हो जायेगा अगर ऐसा हो गया तो ? फिल्म वालों के लिए वैसे ही कहानी का अकाल पड़ा रहता है हर तीसरी फिल्म तो भ्रष्टाचार पर होती है , भ्रष्टाचार नहीं रहेगा तो फिर कहानी कैसे मिलेगी ? सोचिये उस बेचारे मुसद्दी का जिसने ऑफिस ऑफिस खेलते खेलते अपने बच्चों को पाला और उस को हीरो भी बना दिया | सुनते हैं अब वही मुसद्दी एक फिल्म ” मौसम” भी बना रहा है | आप ही बताइए अगर भ्रष्टाचार नाम का धंधा न रहा होता तो ये बेचारे कैसे जीवन यापन करते ? और अपना वो राम गोपाल वर्मा , जानते तो हैं न ? वो तो कहीं भुट्टा ही बेच रहा होता | फिर भी आप कहते हैं कि इस भ्रष्टाचार को ख़तम करें | काहे भाई ? काहे औरों के पेटों पर लात मार देना चाहते हैं | तनिक उनका भी तो सोचिये जो “कुछ” पाने के चक्कर में नेता जी के इधर उधर लगे रहते हैं ? भले ही दुनिया उन्हें चमचा कहे , मगर उन्हें भी तो अपना घर चलाना है कि नाही ? अगर नेता जी को कहीं से कमीशन या नजराना नहीं मिलेगा तो वो अपने चमचों को क्या देंगे ? अगर चमचों को चासनी नहीं मिलेगी तो वो फिर उधर क्यों मुहं मारने जायेंगे ? और जो वो मुहं मारने वहां नहीं जायेंगे तो नेता जी को पूछेगा कौन ? फिर कैसी राजनीति और काहे के लिए राजनीति ? बिना किसी फायदे के लिए कोई कुछ करता है क्या ? अब वो भगवान श्री कृष्ण तो हैं नहीं कि सोच लें ” कर्म किये जा फल कि इच्छा मत कर |”


इस भ्रष्टाचार के खेल से जाने कितनो के घर चलते हैं | टी.वी. की टी.आर.पी. से रिपोर्टर की तनख्वाह बढती है , अखबार के समाचारों से पत्रकारों का घर चलता है | कुछ नहीं तो कम से कम हम जैसे तुच्छ साहित्यकारों के बारे में ही सोचिये जिन्हें भ्रष्टाचार पर लिखने से कुछ संतुष्टि मिल जाती है |


तो भैया जैसा चल रहा है चलने देने में ही क्या बुराई है ? जब हमारे इतने गुनी और योग्य प्रधानमंत्री को इसमें कोई बुराई नज़र नहीं आती तो आप काहे खामखाँ परेशान होते हैं |

ओम प्रकाश आदित्य जी की एक कविता , इस लेख को कुछ  और बड़ा करने और रोचक बनाने के लिए साथ में दे रहा हूँ !

इधर भी गधे हैं , उधर भी गधे हैं
जिधर देखता हूँ , गधे ही गधे हैं  ||

गधे हँस रहे हैं , आदमी रो रहा है
हिंदुस्तान में ये क्या हो रहा है  ?

ये दिल्ली ये पालम गधों के लिए है
ये संसार सालम गधों के लिए है  ||

मुझे माफ़ करना मैं भटका हुआ था
वो थर्रा था जो भीतर अटका हुआ था !!

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