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खान चाचा

Posted On: 18 Oct, 2013 Others में

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yogi sarswat

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दीवार पर लटकती घडी जैसे ही छः बजे का घण्टा बजाती , पत्नी गैस पर चाय बनाने रख देती । टी. वी. पर कार्टून देखते दोनों बच्चों को माँ को देखकर एहसास हो जाता कि उनके पापा का कॉलेज से आने का समय हो गया है । और कुछ ही देर में घर्र -घर्र करती कार जब घर के दरवाज़े पर रूकती तो बच्चे बाहर निकल आते । पापा ! ……पापा !……। क्या लाये हो ? कहते …… पूछते तीन साल की बिटिया आभा और छः साल का बेटा हर्षित , मेरा बैग कंधे से उतारकर अन्दर खींच ले जाते । अपने मतलब की चीजें निकालकर बैग इधर -उधर फैंक देते जिसका खामियाजा , उनकी माँ की डांट के रूप में हमेशा मुझे ही भुगतना पड़ता और मैं , हमेशा की तरह बच्चों के पक्ष में खड़ा मुस्करा देता । पत्नी किसी रोज़ मुस्कराकर साथ देती तो किसी दिन गुस्से में स्वागत करती और पानी का गिलास बिना कुछ कहे सुने पकड़ा देती । चाय …! बन रही है ! लाती हूँ ! यही हँसती -खिलखिलाती जिंदगी चल रही थी ।


बच्चे चाय नहीं पीते थे । लेकिन फिर भी हर रोज़ शाम को तीन कप चाय बनाती थी मेरी पत्नी । एक मेरा , एक उसका और एक ? एक खान साब के लिए ।


असल में खान साब , हमारे कोई रिश्तेदार नहीं थे लेकिन फिर भी हर रोज़ शाम को एक कप चाय साथ जरुर पीते थे । मैं कॉलेज से पहुँचता और वो फैक्ट्री से । थोड़ी देर में आते थे वो करीब साढ़े छः बजे । उम्र होगी करीब 55 वर्ष । लम्बी सफ़ेद दाढ़ी । सिर बालों से गरीब हो रहा था । वेल्डर थे । शायद आठ हज़ार रुपये माहवार की नौकरी । पाँच बच्चे । हमेशा मुश्किलों से जूझते आदमी की कहानी कहते वो और उनका चेहरा । ये दोस्ती भी बड़ी अजीब सी थी । वो वेल्डर , मैं कॉलेज का असिस्टेंट प्रोफ़ेसर । उनकी तनख्वाह आठ हज़ार और मेरी उनसे करीब सात गुना । उनकी उम्र 55 वर्ष और मेरी तैंतीस । उनके पाँच बच्चे और मेरे दो । वो केवल एक कमरे के मकान में रहते थे और मेरे पास दो बेडरूम का बढ़िया घर । बस एक ही चीज़ कॉमन थी हम दौनों में । दौनों ही किराए पर रह रहे थे ।


बहुत दिन नहीं हुए इस बात को । बस छः बरस ! तब मेरी पत्नी गर्भवती थी ! पहली बार ! दोपहर में डॉक्टर को दिखाकर आ रही थी ! शायद शुक्रवार था उस दिन ! रिक्शे पर थी , कोई आया मोटरसाइकिल पर उसके गले से उसके सुहाग की निशानी मंगलसूत्र ले उड़ा जिससे वो भी नीचे गिर गयी और एकदम से सिर में चोट लगने की वज़ह से बेहोश हो गयी ! पास में से ही जलालुद्दीन जुमे की नमाज़ पढ़कर चले आ रहे थे । पत्नी के अंगों से खून निकल रहा था , उन्होंने यानी जलालुद्दीन जी ने उसे तुरंत ही उसी डॉक्टर के पास पहुंचा दिया , उसी रिक्शे में , जिसमें वो आ रही थी ! मुझे घटना , पत्नी की बेहोशी और पापा बनने की जानकारी फोन पर दे दी गयी । मैं जब वहां पहुंचा तो उन्ही जलालुद्दीन को वहां बैठे पाया । तब से लेकर आज तक शायद ही कोई दिन गया हो जब हमने साथ बैठकर चाय न पी हो !


जब भी हम दौनों बैठते , ऐसा कोई विषय न था जिस पर चर्चा न चलता हो । वो कांग्रेस की बात करते , मैं भाजपा की ! वो मधुबाला की बात करते , मैं मल्लिका शेहरावत से लेकर सनी लिओन की ! वो वसीम अकरम की बात करते , मैं सचिन की ! यानी मैं और वो उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव थे लेकिन फिर भी घण्टों साथ बैठते , बैठे रहते । अपनी गली , मोहल्ले , शहर से लेकर अफ्रीका तक की राजनीति की बात कर लेते ! लेकिन न मैं कभी अफ्रीका गया , न वो ! न कोई हारता , न कोई जीतता ! वो अपनी बीड़ी सुलगा लेते और मैं अपना पान मसाला मुँह में दबा लेता । लेकिन दौर चलता रहता । हम अलग अलग कुर्सियों पर बैठे बैठे ही बिल क्लिंटन और ओबामा से लेकर ओसामा तक की ऐसी तैसी कर देते ! कभी कभी तो ऐसा लगता जैसे हम दौनों दुनिया के सबसे बड़े राजनीतिबाज़ हैंऔर देश की बागडोर हमारे ही हाथों में आ गयी है ! वो मुझे ‘सर” कहते और मैं उन्हें खान साब ! बच्चे खान चाचा ! पत्नी ,अंकल जी से काम चला लेती ।


शुरू शुरू में वो बच्चों के लिए कुछ न कुछ जरुर लेकर आते थे लेकिन मेरे बहुत मना करने और समझाने के बाद वो समझ गए लेकिन उनका बच्चों से और बच्चों का उनसे लगाव कम न हुआ ! आभा तो शायद मुझसे ज्यादा उन्हें प्यार करती थी !


आज तो सात बज गए ! खान साब नहीं आये ? फोन था नहीं उनके पास ! कहते थे चलाना ही नहीं आता । जो भी हो , लेकिन मेरे पास उनके किसी परिवार के व्यक्ति से संपर्क नहीं था ! शायद जरुरत ही नहीं रही कभी ! उन्होंने दिया नहीं , मैंने लिया नहीं ! न कभी मैं उनके बच्चों से मिला , न वो कभी आये ! खाली पड़े पड़े बोर हो रहा था , टीवी पर न्यूज़ देखने लगा ! ओह ! दंगा हो गया था शहर में ! कई लोगों के हताहत होने की खबर आ रही थी ! बच्चे और पत्नी कई बार पूछ चुके थे , खान चाचा क्यों नहीं आये पापा आज ? एक बार मैं झल्ला गया तो उन्होंने पूछना बंद कर दिया ! मन में चोर बैठ गया ! मैं न्यूज़ में ये देखना चाह रहा था कि कितने हिन्दू मरे और कितने मुसलमान ! उस वक्त मैं पक्का हिंदूवादी हो गया था । मन में रह रह के गाली निकल रही थीं । जैसे मैं आज सबसे बड़ा हिन्दुत्ववादी हूँ और राणा प्रताप का वंशज और परशुराम की संतान ! आँखों में खून की ज्वाला उतर आई थी ! शायद धर्मांध व्यक्ति ऐसा ही होता होगा जैसे उस दिन कुछ पल के लिए मैं हो गया था ! 9 बजे होंगे ! मोबाइल की घंटी बजी ! अनजान नंबर था ! उठा लिया ! ‘सर ‘ मैं जलालुद्दीन बोल रहा हूँ । वो दंगों में मेरा छोटा बेटा साजिद घायल हो गया है इसलिए आज आपसे और बच्चों से मिलने नहीं आ पाया ! हम्मम ! कैसे हैं दौनों ? ठीक हैं ! फोन काट दिया मैंने ! पत्नी बोली -क्या हुआ ?अंकल जी का फ़ोन था ? मैं उस पर चिल्ला पड़ा , कुछ नही हुआ ! मर जाता तो कम से कम एक तो कम होता !


क्या बोल रहे हैं आप ? आपको पता है कौन हैं खान अंकल ? हाँ , पता है ! एक मुसलमान ! और कुछ नहीं ! और अगर आज वो यहाँ होता तो मैं उसे साफ़ कर देता ! बिलकुल ! यही कर सकते हैं आप ! हर्षित भी वहीँ खड़ा था ,उसका हाथ पकड़कर बोली -कल को इसे कोई घायल कर दे तो कैसा लगेगा आपको ! मैं चिल्ला पड़ा , ऐसा नहीं होगा और अगर होता भी है तो मैं जान ले लुंगा उसकी ! क्षत्रिय का खून है मेरी रगों में ! हो सकता है , किसी के साथ भी हो सकता है ! वो लाल आँखें करते हुए चिल्ला रही थी ! साजिद भी किसी का बेटा है ! ओह ! कैसे इंसान हैं आप ?


दीपक “भारतदीप “के शब्द बहुत सटीक लगते हैं:

सभी का जमीर गहरी नींद सो गया है,
इसलिये यकीन अब महंगा हो गया है।
भरोसेमंदों ही लूटने लगे हैं ज़माने के घर
इंसानियत की वर्दी में शैतान खो गया है।


थोड़ी देर के बाद कान में आवाज़ आ रही थी ! मेरी पत्नी की थी ! हाँ ,अंकल ! मैं रश्मि बोल रही हूँ ! कैसा है आपका बेटा साजिद ? मैंने अपना फोन देखा , वो अपनी जगह पर नहीं था ! मैं समझ गया ,मेरा ही फ़ोन चल रहा है और वही नंबर डायल किया होगा जिस पर अभी बात हुई है ! हम आ रहे हैं ! नहीं , नहीं ………। कोई परेशानी नहीं होगी ! आप परेशां मत हो ! भगवान की कृपा से सब ठीक हो जाएगा ! मेरे कानों में ये शब्द शीशे की तरह घुस रहे थे !


जैसा कि अक्सर होता था , मैं आज फिर अपनी ही पत्नी से हार गया था और कुछ ही देर बाद मैं अपने परिवार के साथ , खान साब के परिवार से मिल रहा था ! अस्पताल में ! बच्चे चिपक गए अपने खान चाचा से !


फ़कीर मोहम्मद घोसी के लिखे चंद शब्द :

हर इक मोड़ पर बैठे हैं
फन फैलाए फणीधर यत्र-तत्र-सर्वत्र
शरीफों के अरमान उड़ रहे हैं बनकर भाप
ईमानदारी का नहीं कर रहा कोई जाप


और मैं , शर्मिंदा सा चुचाप खडा अपने आपको शैतान से इंसान बनाने की कोशिश कर रहा था ! मैं सोच नहीं पा रहा था कि हमेशा से सहनशीलता और मानवता का पाठ पढने और पढ़ाने वाला एक हिन्दू का खून कैसे इतना गर्म हो गया था ! मैं अपने संस्कारों को शायद कुछ पल भूल गया था ! आज दक्षिणी ध्रुव और उत्तरी ध्रुव सचमुच बहुत दूर जा रहे थे किन्तु धीरे धीरे एक सप्ताह में दंगा ख़त्म हो गया था ! एक तूफ़ान अपना असर दिखा के शांत हो रहा था और समाज के साथ साथ हमारी आपस की दूरियां भी सिमट रही थीं !


जय हिन्द ! जय हिन्द की सेना

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