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सब कुछ बिकता है ( चुनाव में धनबल और बाहुबल का औचित्य )

Posted On: 14 Feb, 2012 Others में

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yogi sarswat

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राजनीति ! सच में देखा जाये तो एक ऐसा धंधा है जिस में एक बार निवेश कर दिया जाये तो आजीवन ही नहीं बल्कि सात पुश्तों तक और कुछ भी करने की आवश्यकता ही नहीं रहती ! अच्छा खासा रिटर्न मिलता रहता है , रुतबा और दबदबा अलग से ! तो फिर ऐसे धंधे में कौन नहीं आना चाहेगा ? अब वो दिन तो गए जब राजनीति को समाज सेवा माना जाता था , लेकिन नेता लोग अब भी इसे धंधा मानने को तैयार नहीं होते ! आपने देखा होगा सुना होगा , हर कोई राजनीतिक व्यक्ति राजनीति को समाज सेवा ही बताने की कोशिश करता रहता है जबकि हकीकत ये है कि इन राजनेताओं ने ही राजनीति को मुनाफे का धंधा बनाया है !
ऐसा नहीं है कि राजनीति में सब लोग ही पैसा बनाने या दबदबा बनाने के लिए ही आते हैं किन्तु ज्यादातर लोग ऐसे ही हैं जो राजनीति को दुधारू गाय समझते हैं और येन केन प्रकारेण सत्ता तक पहुँचने की कोशिश करते हैं !

चलता रहेगा ये कुर्सी का खेल !
फिर चाहे भारत लेने जाये तेल !!

राजनीति में धनबल :

भारतीय चुनाव आयोग , टी . एन. शेषन के समय से हर चुनावों में कुछ ना कुछ सुधार करने के लिए अंगड़ाई लेता रहा है ! यूँ चुनाव आयोग के सुधारों ने बहुत कुछ बदला भी है ! लेकिन उसे पूरी तरह सफल नहीं कहा जा सकता क्योंकि आज भी प्रदेश स्तर के चुनावों में जिस तरह से पैसे का बोलबाला है वो किसी से छुपा हुआ नहीं है ! उत्तर प्रदेश और पंजाब में पकडे गए करोड़ों रुपये ये बताने के लिए काफी हैं कि चुनाव आयोग कितना भी जोर लगा ले , प्रत्याशी पैसे से हर चीज़ को , यहाँ तक कि आम मतदाता के अधिकार को भी खरीद लेना चाहते हैं ! हमने वो समय भी देखा है जब , धन और रुतबे के दम पर गाँव के गाँव एक ही प्रत्याशी को वोट करने पर मजबूर हो जाते थे | ये सनातनी व्यवस्था कुछ बदली तो है किन्तु पूर्ण रूप से ख़त्म नहीं हुई | आज भी सामंतवादी सोच के लोग ये सोचते हैं कि साडी और कम्बल बाँट कर , घर घर में कलर टेली विज़न देकर वो वोटर को अपने लिए पक्का कर सकते हैं | उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि चुनाव आयोग क्या कहता है या कानून क्या कहता है ? ये लोग हमेशा चुनाव आयोग को अंगूठा दिखाने की कोशिश में रहते हैं , इन्हें ये लगता है कि उनके मुकाबले में चुनाव आयोग गरीब और सामान्य लोगों को लाकर खड़ा कर देना चाहता है ! ये लोकतंत्र को राजतन्त्र में बदलने के लिए आतुर हैं ! इन्हें चुनाव आयोग के फैसले इनकी सामंतवादी सोच पर प्रहार करते हुए लगते हैं | कुछ तो परिवारों ने राजनीति को और भारत में उच्च पदों को अपनी रखैल ही समझ रखा है | उन परिवारों में बच्चा जैसे पैदा ही “राजा ” बनने के लिए होता है , चाहे वो अक्ल से बिलकुल पैदल हो , चाहे वो चपरासी बनने की औकात ना रखता हो किन्तु वो भारत का प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देखने लग जाता है | और तो और उसका पूरा परिवार और उसके चमचे उसे इस देश का सर्व ज्ञाता , सर्व प्रिय बताने में कोई हिचक महसूस नहीं करते ! उसके पीछे चलने में जिन्हें अपनी इज्ज़त लगती हो , ऐसे लोग जब राजनीति में आते हैं तो कैसे भी इस देश को लूट लेना चाहते हैं !


ये शेरों का चरण पत्र है भेड़ सियारों के आगे
वाट वृक्षों का शीश नमन है खर पतवारों के आगे
जैसे कोई ताल तलय्या गंगा जमुना को डांटे
चार तमंचे मार रहे एटम के मुह पर चांटे
किसका खून नहीं खौलेगा पढ़ सुनकर अख़बारों में
शेरों की पेशी करवा दी चूहों के दरबारों में
इन सब षड्यंत्रों से पर्दा उठाना बहुत ज़रूरी है
पहले घर के गद्दारों का हटना बहुत ज़रूरी है
पांचाली के चिर हरण पर जो चुप पाए जाते हैं
इतिहास के पन्नो में वो सब कायर कहलाते हैं ……..


राजनीति अब कोई सैकड़ा -हज़ार का खेल तो रहा नहीं , लाखों और करोड़ों की बात होती है ! तो जब कोई लाखों करोड़ों खर्च करके इस देश का नीति निर्माता बनता है तो निश्चित रूप से वो इसका रिटर्न भी चाहता है , और फिर शुरू हो जाती है इस देश को और प्रदेश को लूट खाने की दौड़ ! आज हालात एकदम अलग हैं ! सफल नेता तभी बन सकता है जब उसके पास अगला चुनाव लड़ने के लायक जमा पूँजी हो | अगर कोई दो चुनाव हार गया तो वो तो खाली हाथ ही हो जायेगा , लेकिन एक बार मौका मिलते ही वो अपनी भरपाई करने लग जाता है , आखिर क्यों ना करे ? राजनीति तो आज धारावाहिक कार्यक्रम हो गई है , जो कि बिना पैसे के चल ही नहीं सकती | सत्ता के चैनल युद्ध में वही नेता या पार्टी सफलता हासिल कर सकती है जिसके पास मोटा प्रायोजक हो | बिना प्रायोजक के सत्ता संघर्ष में सफल होना बहुत मुश्किल माना जाता है ! क्योंकि चुनाव में शराब व नकद बांटने से लेकर जाने क्या क्या उपलब्ध कराना पड़ता है | और ये सब उपलब्ध कराने के लिए कोई व्यक्ति अपने घर को फूंक कर पैसा नहीं लगाएगा | सीधी सी बात है कि इसके लिए उसे इन्हीं स्रोतों से ही पैसा लगाना पड़ेगा और चुने जाने के बाद उनकी बात भी माननी ही पड़ेगी | आज के ओद्योगिक और आथिक साम्राज्य ऐसे ही नहीं खड़े हुए हैं ? आर्थिक रूप से उदार भारत में जितने विशाल आर्थिक साम्राज्य खड़े हुए हैं अगर उनकी नींव गहरे तक खोदी जाये तो हर जगह कुछ नियम और कानून दबे हुए कंकाल के रूप में मिलेंगे !

राजनीति में बाहुबल :

आज की राजनीति में अगर कर्पूरी ठाकुर होते तो शायद कहीं फिट नहीं बैठते ! अकेला चलो की राजनीति आज के दौर में केवल समय की बर्बादी और अपना धन खर्च करने के अलावा कुछ भी नहीं है ! जब तक सांय सांय करती , लाल बत्ती लगी गाडी सड़क पर सरपट दौड़ते हुए , यातायात नियमों को धता बताते हुए नहीं जाती तब तक किसी को पता ही कहाँ चलता है कि इस गाडी में हमारे नेता जी बैठे हैं या ये गाडी नेता जी की है !
चुनाव के समय में अगर प्रत्याशी एक अकेली गाडी लेकर निकल जाए तो पुलिस वाला ही उसे हड़का देगा इसलिए अपना रुतबा बनाये रखने के लिए उसे ना केवल ज्यादा गाड़ियाँ चाहिए होती हैं बल्कि उसकी धमक बनाये रखने के लिए गुंडों की फ़ौज भी रखनी ही पड़ती है ! नेता तो वही होगा ना जो अपने को औरों से अलग , सामान्य लोगों से ऊपर समझे ? नहीं तो फिर क्या सब नेता नहीं बन जायेंगे ? नेता को जब तक ये भ्रम ना हो जाये की वो इस दुनिया का नहीं है चाँद से उतर कर आया है तब तक वो कैसा नेता और कैसी नेता गिरी ?
हम खुद भी कहाँ सीधे साधे और सज्जान लोगों को अपना वोट देने की कोशिश करते हैं ? वोट तो बाद की बात है हम उसका नाम तक नहीं जानते लेकिन अगर हमारे क्षेत्र में कोई बाहुबली , गुंडा , मवाली , चोर , हिस्ट्रीशिटर चुनाव लड़ने के लिए आता है तो उससे पहले उसका नाम हमारे पास पहुँच जाता है | तो उसका चुनाव प्रचार तो ऐसे ही हो गया ! अब भारतीय कानून भी उसे कैसे रोकेगा , जब उस कानून की कोई परवाह ही नहीं करता | तो आधा चुनाव प्रचार तो उसका उसके द्वारा किये गए पुण्य कर्तव्यों से हो गया , बाकी का आधा प्रचार उसके गुंडे लोग धमका धमका के कर डालेंगे | बस बन गया काम ! अब वो जीतेगा , और धमकाएगा , उसके चेले चपाटे धमकाएंगे ! पहले अकेला वो ही पुण्य करता था , अब उसके सौ दो सौ समर्थक ये काम करेंगे | सैंयाँ भये कोतवाल तो अब डर काहे का ?

उत्तर प्रदेश के इन चुनावों में एक से एक महारथी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं , कुछ जीत भी जायेंगे , जो नहीं जीतेंगे वो फिर आयेब्गे दोबारा मैदान में ! जो जीत जायेंगे वो , हारे हुओं की भरसक मदद करेंगे ! आखिर चोर चोर मौसेरे भाई | क्या पता कल को वो जीत जायें और ये हार जायें , तब क्या होगा ? इसलिए हार जीत अपनी जगह , अपने सम्बन्ध अपनी जगह ! धंधा है भाई ! और धंधा कोई इतनी जल्दी थोड़े ही बंद कर देता है ?
उत्तर प्रदेश के चुनावों में किसी भी पार्टी ने ऐसे महाबली लोगों से मुंह नहीं मोड़ा है ! कम या ज्यादा सभी ने इन्हें अपने अपनी पार्टी का निमंत्रण पत्र थमाया ही है ! साफ़ सुथरी राजनीति करने का दम भरने वाली कॉंग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ने भी इन्हें खूब मलाई बांटी है फिर ऐसे में कैसे और किससे उम्मीद करी जा सकती है कि इन चुनावों में कोई अपराधी तत्त्व नहीं जीतेगा ? एक पार्टी विशेष ने तो ढूंढ ढून्ढ कर ऐसे ही लोगों को टिकट थमाया है जिन पर कम से कम चार मुकद्दमे लगे हैं !
ये मेरे आसू जिन्हें कोई पोछने वाला भी नहीं ,
कोई आँचल इन्हे मिलता तो सितारे होते ||.

निष्कर्ष के तौर पर मैं सिर्फ ये कहना चाहता हूँ कि कोई भी पार्टी ईमानदारी से धन और बाहुबल से पीछा नहीं छुड़ाना चाहती है ! सिद्ध्हंत अपनी जगह , सत्ता अपनी जगह ! सत्ता अगर मिले तो हर कोई अपने संस्कार त्यागने को तैयार बैठा है ! राजनीति , विशेष रूप से उत्तर प्रदेश की राजनीति ना तो धनबल और बहुबल के बगैर कभी चली है और ना ही इतनी जल्दी कोई उम्मीद बनती दिख रही है ! कहने वाले कह सकते हैं कि चुनाव आयोग इस दिशा में पूरा प्रयास कर रहा है किन्तु जब तक जन मानस , ऐसे लोगों को नकारना शुरू नहीं करेगा तब तक कोई भी सार्थक उम्मीद करना बेईमानी होगा ! हमें किसी और से नहीं बल्कि खुद से ये वादा करना ही होगा की हम ही इस तस्वीर के रंगों को बदल सकते हैं !
वह प्रदीप जो दीख रहा है
झिलमिल दूर नहीं है |
थक कर बैठ गए क्या भाई !

मंजिल दूर नहीं है !!


यह अतीत कल्पना,
यह विनीत प्रार्थना,
यह पुनीत भावना,
यह अनंत साधना,
शांति हो, अशांति हो,
युद्ध, संधि, क्रांति हो,
तीर पर, कछार पर, यह दिया बुझे नहीं,
देश पर, समाज पर, ज्योति का वितान है

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