blogid : 4185 postid : 32

बेरंग रंगों की रंगोली.....

Posted On: 17 Mar, 2011 Others में

*काव्य-कल्पना*Just another weblog

satyam shivam

24 Posts

32 Comments

बेरंग रंगों की रंगोली,
और मौन के धुन का गीत कोई,
कैसे बेरंग छटाओं में,
ढ़ुँढ़ु मै रंगों की होली।

तुम अपनी चुनर रंग लो,
रंगीन बना लो अब चोली,
मेरे रंगों में रंग नहीं,
बेरंग है जीवन की होली।

अब एक रंग ही साध लिया,
सब रंग है मैने बिसराया,
बस गुमशुम सी तेरी आहट पर,
मैने तो कई गीत बनाया।

अब इन बेरंग सी रलीयों में,
नादान ये मन कब तक भटके,
लेकर आओ तुम फिर भर कर,
अपनी अँजूरी में रंगों की झोली।

बहती है अब भी वैसी पवन,
जो दिल का दर्द समझती है,
धरती के प्रेम में मग्न गगन,
बूँदे बन कर तो बरसती है।

सुनकर ये प्रीत के गीत कही,
मन मेरा खेले है होली,
और स्वर की मधुर अलापों से,
निकले मधु भावों की बोली।

कभी देख श्याम को मीरा ने,
रँगवायी थी मन की चोली,
और बेसुध होकर नाच रही थी,
गोपी,ग्वालन की टोली।

सब संग जलाकर प्रेम धुनी,
बस श्याम का नाम पुकारते,
और श्याम बचा कर लाज द्रौपद के,
कष्ट से पल में उबारते।

बेरंग है जीवन मतवाला,
ना फिक्र किसी की रहती है,
कभी मंदिर,मस्जिद,गुरुद्वारा,
हर आँगन में गंगा सी बहती है।

रंगों का बोझ है ये जीवन,
जिसमें जो रंगा वो पछताया,
पर मन की बेसुध बाँसुरी को,
तो बस रंग ही है भाया।

मै आज तुम्हारी गलियों में,
बेरंग सा बन कर भटकूँगा,
तुम देख कर मुझको,
बस कह देना,
ये है दिवानों की टोली।

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
  • Facebook
  • SocialTwist Tell-a-Friend

अन्य ब्लॉग